Cold war era | Cold War and their reasons

Cold war, origin of cold war, end of cold war

Cold War and their reasons

शीत युद्ध
शुरुआत
अर्थ
कारण
अंत

शीत युद्ध शब्द का प्रयोग तनाव कि उस स्थिति के लिए किया गया जो दो पूर्व मित्र राष्ट्रो – संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सोवियत संघ के बीच में था।

जापान के आत्मसमर्पण के साथ ही 1945  में द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया इस युद्ध में मित्र राष्ट्रो की जीत हुई, लेकिन जीत के बाद मित्र राष्ट्रो के बीच तनाव बढ़ने लगा। इसी तनाव का परिणाम शीत युद्ध था।

शीत युद्ध की उत्पत्ति Origin of the cold war

जब 1941 में जापान ने सोवियत संघ पर हमला किया तथा दिसम्बर 1941  में जापान ने अमेरिका पर बमबारी किया तो दो परस्पर विरोधी विचारधारा – साम्यवादी सोवियत संघ और पूँजीवादी अमेरिका मैत्रीपूर्ण संबंध में आ गए और वो फासिस्ट तानाशाही को समाप्त करने के लिए साथ हो गए। लेकिन जापान के पराजय के साथ ही इस मित्रता में भी दरार आ गई।

इस दरार ने एक विचित्र शत्रुता को जन्म दिया जिस ने युद्ध का रूप ले लिया, इस युद्ध में सेना तथा शस्त्रों का प्रयोग नहीं किया गया। इसी को हम शीत युद्ध की संज्ञा देते हैं।

शीत युद्ध का अर्थ

यहाँ हम कुछ विद्वानों के अनुसार शीत क्या है उस का क्या

अर्थ है इस बात को समझने का प्रयास करते हैं –

वाल्टर लिपमैन – वाल्टर लिपमैन के अनुसार शीत युद्ध दो शक्ति गुटों के मध्य ऐसी युद्ध जैसी स्थिति से था जो कि वास्तव में युद्ध नहीं था। यह केवल युद्ध की स्थिति थी। लिपमैन ने इसे एक ‘कूटनीतिक युद्ध’ था।

फ्लेमिंग – फ्लेमिंग के अनुसार यह ऐसा युद्ध था जो ‘युद्ध स्थल’ में नहीं लड़ा जाता। यह मानवों के मस्तिष्क में होता है। इस युद्ध में एक व्यक्ति द्वारा अन्य के मस्तिष्क को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता हैं।

इस युद्ध में दोनों गुटों द्वारा एक-दूसरे को राजनीतिक तथा राजनयिक उपायों के द्वारा नीचा दिखाने का प्रयास किया जा रहा था। इस युद्ध में दोनों गुटों के बीच हमेशा सैनिक प्रतिद्वंद्विता तथा गुप्तचरी की प्रक्रिया चलती रहती थी। यह एक मनोवैज्ञानिक युद्ध था। इस युद्ध में अपने – अपने समर्थकों को बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा था। यह ऐसा युद्ध था जिस में सैनिकों, तोपों, टैंकों, विमानों आदि का निर्माण तो किया गया लेकिन उन का प्रयोग नहीं किया गया।

दो गुट

एक शक्ति गुट का नेतृत्व – संयुक्त राज्य अमेरिका के हाथों में था।

जिसे हम अमेरिकी गुट, आँग्ल-अमेरिकी गुट, पश्चिमी गुट, लोकतांत्रिक गुट कहते हैं।

साम्यवादी गुट इसे पूँजीवादी गुट कहकर इसकी निंदा करते थे।

समर्थक – ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, इटली, बेल्जियम, आस्ट्रेलिया, नीदरलैंड, ग्रीस, पाकिस्तान, तुर्की, यह सारे देश इस गुट के समर्थक थे।

दूसरे गुट का नेता – सोवियत संघ था।

जिसे हम पूर्वी गुट, सोवियत गुट, समाजवादी गुट कहते हैं।

पश्चिमी गुट इस को अधिनायकवादी गुट कह कर इस कि आलोचना करते थे।

समर्थक – पोलैंड, बुल्गारिया, रूमानिया, हंगरी तथा चेकोस्लोवाकिया इस गुट के समर्थक थे।

शीत युद्ध के दौरान दोनों गुटों ने अपने-अपने समर्थक देशों की सहायता की उन्हें आर्थिक सहायता दी, कई देशों में सैनिक अड्डे स्थापित किया, सैनिक संधिया की, क्षेत्रीय संगठनों की स्थापना की।

सोवियत संघ तथा अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने विश्व को तृतीय विश्व – युद्ध तक पहुँचा दिया इसी को हम शीत युद्ध के नाम से जानते हैं।

शीत युद्ध के कारण Causes of Cold War

शीत युद्ध के कई प्रेरक तत्वों का निर्धारण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था ने किया। कुछ अन्य तत्वों का निर्धारण विचारधाराओं तथा व्यक्तियों ने किया। शीत युद्ध के निम्नलिखित कारण थे –

(1) संघर्षों की अनिवार्यता Inevitability of Conflicts

जैसा कि हमे पता है अंतरराष्ट्रीय संबंध संघर्ष पर आधारित हैं लेकिन संघर्ष के साथ-साथ हमें सहयोग भी देखने को मिलता हैं। सहयोग का आधार एक समान खतरे से निपटना होता है परंतु जैसे ही शत्रु या खतरा टल जाता हैं सहयोग फिर से संघर्ष में बदल जाता हैं।

शीत युद्ध के दौरान भी हमें  यही देखने को मिला, नात्सी – फासिस्ट शक्ति का सामना करने के लिए दो परस्पर विरोधी विचारधारा सोवियत संघ और अमेरिका साथ मिल गए लेकिन नात्सी – फासिस्ट शक्ति की पराजय के बाद दोनों राष्ट्रो में संघर्ष फिर से उत्पन्न हो गया जिस ने  शीत युद्ध को जन्म दिया। शीत युद्ध के लिए यह एक बहुत बड़ा कारण था।

(2) वैचारिक तत्व Ideological Factor

संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ में वैचारिक मतभेद था यह भी शीत युद्ध का मुख्य कारण था। एक ओर पूँजीवादी पर आधारित उदार लोकतंत्र था तो दूसरी ओर समाजवादी राज्य व्यवस्था। दोनों देशों के बीच वैचारिक मतभेद ने संघर्ष को जन्म दिया। दोनों देशों मे केवल वैचारिक मतभेद ही नहीं दोनों की आर्थिक व्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था भी भिन्न थी। दोनों देशों ने एक दूसरे का विरोध किया और अपने को उच्च दिखाने का प्रयास किया जिस ने  शीत युद्ध को जन्म दिया।

(3) पारस्परिक संदेह Mutual Suspicion

दोनों देशों के बीच संदेह की भावना ने शीत युद्ध को जन्म दिया। पश्चिम देश द्वितीय विश्व युद्ध में तो साथ लड़ रहे थे लेकिन उन के बीच आपसी संदेह था।

दोनों देशों में असुरक्षा की भावना थी।

निम्नलिखित उदाहरणों के द्वारा इन के बीच संदेह को समझा जा सकता हैं-

(क) पश्चिमी देशों ने सोवियत संघ की बोल्शेविक क्रान्ति को विफल करने का प्रयास किया जिस से सोवियत संघ में संदेह की भावना ने जन्म लिया।

वहीं ब्रिटेन और अमेरिका यह नहीं भुल पाए की 1917  की बोल्शेविक क्रान्ति की वजह से सोवियत संघ ने जर्मनी से युद्ध बंद कर दिया था।

(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका अणु बम का निर्माण कर चुका था लेकिन उस ने सोवियत संघ को अंधकार में रखा। क्योंकि अमेरिका सोवियत संघ पर विश्वास नहीं करता था।

(ग) पश्चिमी देशों का मानना था कि उन्होंने सोवियत संघ को अत्यधिक सहायता दे दी है।

परंतु सोवियत संघ का मानना था कि सहायता पर्याप्त नहीं थी।

इन कारणों ने शीत युद्ध को जन्म दिया।

अंत के कारण

दोनों देशों ने यह अनुभव किया कि यदि युद्ध होता है तो दोनों का ही नाश हो जाएगा दोंनो देशों ने  युद्ध के परिणामों को देखते हुए युद्ध ना करने का निर्णय लिया। दोनों देशों में आपसी वार्ताओं का दौर शुरू हो गया और उन्होंने अपने संबंधों को सुधारने के लिए प्रयास किए जिस ने युद्ध को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

जब विश्व दो गुटों में बट चुका था तो भारत ने अन्य नव स्वतंत्र राष्ट्रो के साथ मिलकर गुटनिरपेक्षता कि नीति को अपनाया और किसी भी शक्ति गुट में शामिल ना होने का निर्णय लिया। गुटनिरपेक्षता ने गुट बंदी की विचारधारा को तोड़ा जिस से युद्ध समाप्त हुआ।

शीत युद्ध के समाप्त होने का सब से महत्वपूर्ण कारण यह था कि सोवियत संघ का अब विघटन हो चुका था जिस के बाद सोवियत संघ 15 राज्यों में बट गया और विघटन के बाद रूस इतना शक्तिशाली नहीं रह गया था कि वह युद्ध लड़ पाए इस प्रकार शीत युद्ध का अंत हो गया और विश्व में केवल एक मात्र शक्ति अमेरिका बच गया।

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