Concept and Theories of Public Policy

लोक – नीति
(Public Policy) 

मुख्य विषय

लोक – नीति की अवधारणा एवं इसके सिद्धांत 

 (Concept and Theories of Public Policy) 


लोक प्रशासन में नीति निर्माण की प्रासंगिकता 

(Relevance of Policy – Making in Public Administration) 


लोक – नीति निर्माण की प्रक्रिया 

(Process of Public Policy Formulation) 


नीतियों का कार्यान्वयन 

(Implementation of Policies) 


लोक – नीति का मूल्यांकन 

(Evaluation of Public Policy) 

Introduction

* आधुनिक शासन – व्यवस्था में लोक – नीति का विशेष महत्व है।

* लोक कल्याण की भावना पर आधारित है।

* सरकार का एक एकमात्र उद्देश्य जनता की मांगों को पूरा करना और उन की समस्याओं का समाधान करना होता है।

इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सरकार को निर्णय लेती है उसे लोक – नीति कहते हैं।

लोक – नीति की अवधारणा एवं इसके सिद्धांत
(Concept and Theories of Public Policy)

सरकार का एक बहुत महत्वपूर्ण कार्य नीति निर्धारण है। लोक नीतियाँ सरकारी निकायों तथा सरकारी अधिकारियों द्वारा विकसित की जाती है। लेकिन गैर सरकारी लोगों तथा एजेंसियों का भी उन पर प्रभाव पड़ता है। लोक नीतियों का संबंध किसी विशेष प्रश्न पर निश्चित समय के भीतर की गई कार्यवाही से होता है।

लोक – नीति “नियमों का एक ऐसा समूह है जिन्हें निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

परिभाषा –

रिचार्ड रोज (Richard Rose) –” नीति कोई निर्णय नहीं होता है अपितु कार्यवाही हेतु मार्ग है। यह नीति ही है जो किसी उदेश्य को प्राप्त करने के लिए ढाँचा उपलब्ध करवाती है।,

थामस, आर. डाई (Thomas R. Dye) – “लोक नीति वह है जिसके अंतर्गत या तो सरकार कुछ करती है या कुछ नहीं करना चाहती हैं।

भारतीय संदर्भ में – ये सरकारी नियमों तथा कार्यक्रम होते हैं जिन पर व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से विचार – विमर्श किया जाता है।

लोक – नीति की अवधारणा के सिद्धांत 

1. लोक – नीति नियमों पर आधारित होती है। लोक – नीतियों को कानूनी स्वीकृति होती है इस लिए यह नागरिकों पर बाध्यकारी भी होती है।

2. लोक – नीति वह है जो सरकार वास्तव में करती है, बजाय इसके कि सरकारें क्या करना चाहती हैं।

3. लोक – नीतियों द्वारा सरकारी अभिकरण भी नीति निर्माण प्रक्रिया पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डाल सकते हैं या उसे प्रभावित कर सकते हैं।

4. लोक – नीति का स्वरूप सकारात्मक और नकारात्मक हो सकता है। सकारात्मक रूप में किसी समस्या या विषय पर सरकारी कार्यवाही की जा सकती है और नकारात्मक रूप में उस विषय पर कोई कार्यवाही ना करना।

5. लोक – नीति लक्ष्योन्मुख होती है। लोक – नीति का निर्माण एवं कार्यान्वयन जनसामान्य के हित के लिए सरकार के उद्देश्य होते हैं।,

6. लोक – नीति सरकार के सामूहिक कार्यों का परिणाम होता है। यह सामूहिक रूप से जनप्रतिनिधियों (मंत्रीगण और सांसद) एवं प्रशासनिक अधिकारियों के समन्वित प्रयास होता है।

लोक –  नीति के विभिन्न रूप
(Various forms of Public Policy),

1. वितरक  नीतियां (Distributive Policies) : वितरण नीतियां समाज के विशिष्ट वर्गों के लिए होती है। ये लोक कल्याण अथवा स्वास्थ्य के क्षेत्र में हो सकती है। उदाहरण – समेकित बाल विकास सेवाएं, इन्दिरा महिला योजना, पोषाहार प्रदर्शन कार्यक्रम आदि।

2. तात्विक एवं सारगत नीतियां (Substantive Policies) : उन की उत्पत्ति समाज की आवश्यकता तथा संविधान से होती है। यह नीतियां किसी विशेष वर्ग से संबंधित नहीं होती बल्कि इन का संबंध पूरे समाज के विकास से होता है।, उदाहरण – शिक्षा का प्रबंध, रोजगार के अवसर, कानून एवं व्यवस्था बनाए रखना, प्रदूषण की रोकथाम के लिए कोई विधान आदि।

3. पुन: वितरण नीतियां (Redistribute Policies) : पुन :वितरण नीतियों का संबंध नीतियों की पुनः व्यवस्था से है जो मूल सामाजिक – आर्थिक परिवर्तन लाने से संबंधित होती है। लोक कल्याण सेवाओं का वितरण समाज के विशिष्ट वर्गों से बेमेल होता है, अंत ऐसी सेवाओं का पुन: वितरण नीतियों द्वारा सीमित किया जाता है।

4. नियंत्रिक नीतियां (Regulatory Policies) : नियंत्रिक नीतियों का संबंध व्यापार – व्यवसाय, सुरक्षा उपाय, जनोपयोगी सेवाओं आदि के नियंत्रण से है। इस प्रकार के नियंत्रण सरकार की ओर से काम करने वाली स्वायत्तशासी संस्थाएं करती है। उदाहरण – भारतीय रिजर्व बैंक, निर्वाचन आयोग, राज्य यातायात नियम आदि संस्थाएं।

लोक – नीति निर्माण की प्रक्रिया
(Process of Public Formulation)

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PS Study Center

लोक – नीति निर्माण कि प्रकिया में सरकारी तंत्र तथा गैर – सरकारी तंत्र शामिल होते हैं।

सरकारी तंत्र (Government Mechanism)

1. विधायिका (Legislature) : विधानमंडल विधेयक और नीतियों पर बहस करती है विश्लेषण करती है उन मे सुधार करती है और उन नीतियों को स्वीकृति भी देती है। भारत में लोक नीति के निर्माण में संसद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

2. कार्यपालिका (Executive) : इसका तात्पर्य राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं मंत्रिमंडल, मंत्रिमंडलीय समितियों एवं प्रधानमंत्री कार्यालय से है। भारत जैसे संसदीय शासन प्रणाली वाले देश में मंत्रिमंडल सरकारी गतिविधि के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में संबंधित लोकनीति की शुरुआत एवं निर्णय करता है। मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बिना कोई भी नीतिगत प्रस्ताव प्रभावी नहीं हो सकता। नीति निर्धारण के क्षेत्र में प्रधानमंत्री को विशेष दर्जा हासिल होती है। नीति निर्माण का प्रभावी निकाय केबिनेट होता है।

3. न्यायपालिका (Judiciary) : न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है और न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि वैधानिक तथा किसी भी प्रशासनिक कार्यवाही द्वारा उसके किसी प्रावधान का उल्लंघन ना हो रहा हो। न्यायपालिका यह देखती है कि नीतियों के निर्धारण इस तरीके से हो कि उन नीतियों का नागरिकों के मौलिक अधिकारों से कोई टकराव ना हो। नीति निर्माण प्रक्रिया में न्यायपालिका सरकार को दिशा – निर्देश देती है।

4. प्रशासन तंत्र (Administration) :” प्रशासन तंत्र केवल नीतियों को क्रियान्वित ही नहीं करता बल्कि नीति निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह बड़े नीति प्रस्तावों को तैयार करता है, यह उन सामाजिक समस्याओं का विश्लेषण करता है और उन का समाधान निकालता है जिन पर तुरंत ध्यान देना आवश्यक होता है। यह मुख्य नीतियों को उप नीतियों में बदलता है, कार्य के लिए योजनाएं बनाता है।

गैर – सरकारी तंत्र (Non – Government Mechanism) 

नीति निर्माण में गैर – सरकारी तंत्र की भूमिका को भी निम्न भागो में बांटा जा सकता है –

1. जनसंचार माध्यम (Mass Communication) : जनसंचार माध्यम जैसे – समाचार पत्र, पत्रिकाएं, रेडियो, टेलीविजन आदि। यह सारे माध्यम समाज की समस्याओं को उन की आवश्यकताओं तथा आकांक्षाओं को सामने लाता है। यह जानकारी लोक – नीति के निर्माण में उपयोगी साबित होती है। जनसंचार माध्यम जनचेतना बढ़ाने और समाज में परिवर्तन लाने में सहायक है। जनसंचार माध्यम लोक – नीतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है जिस से बेहतर लोक – नीति का निर्माण हो।

2. दबाव समूह (Pressure Groups) : दबाव समूह ऐसे संगठित समूह होते हैं जो सरकारी निर्णयों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। ये समूह राजनीतिक दलों से भिन्न होते हैं। उनका प्राथमिक उदेश्य उन लोक नीतियों के प्रतिपादन को प्रभावित करना होता है जो कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इनके हितों को प्रभावित करता हो या समाज के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करता हो। दबाव समूह का संगठन जितना अधिक मजबूत होगा वह उतना ही ज्यादा लोक नीतियों को प्रभावित करता है।

3. अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ (International Agencies) : वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अनेक अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ लोक नीति को प्रभावित करते हैं। जैसे – विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व व्यापार संगठन आदि।

4. राजनीतिक दल (Political Parties) : राजनीतिक दल आम चुनाव के समय अपने घोषणा पत्र जारी करती है। यह घोषणा पत्र उस पार्टी की विचारधारा और कार्यक्रम होते हैं जिस के आधार पर वह आम लोगों से वह समर्थन मांगती है और जब  पार्टी जीत जाती है तो उस पार्टी के घोषणा पत्र ही लोक नीतियों का निर्माण करती है।

5. सामाजिक आंदोलन (Social Movements) : सामाजिक आंदोलन नीति निर्माण को प्रभावित करते हैं। सामाजिक आंदोलन जो कि उनके सदस्यों से संघटित हितों तथा दृष्टिकोणों के द्वारा सामने आते हैं, नीति निर्माताओं को बनाई गई नीति में परिवर्तन करने अथवा नई नीतियां बनाने के लिए बाध्य करते हैं। सामाजिक आंदोलन द्वारा रखी गई मांगों की निष्पक्षता, व्यापक उद्देश्यों, अन्य सामाजिक वर्गों की मांगों तथा उपलब्ध साधनों को ध्यान में रखकर नीति निर्माता सामाजिक आंदोलनों द्वारा सामने रखे गए मुद्दों पर नीतियों का निर्माण करते हैं।

6. लोकमत (Public Opinion) : साधारणत :लोकमत जनता के प्रभावशाली बहुमत का मत है, परंतु यह आवश्यक नहीं है कि लोकमत बहुमत का ही मत हो। उसके निमार्ण के लिए किसी हद तक अल्पमत की भी स्वीकृति आवश्यक होती है।

1 Comment on "Concept and Theories of Public Policy"

  1. Sir aapne to relevance to btaya nhi or na hi implementation,,, Im ps(HONS) Student 3rd year

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