Homosexuality And Section 377

Homosexuality And Section 377

होमोसेक्शुऐलिटी और सेक्शन 377

होमोसेक्शुऐलिटी का मुद्दा आज कोई पहली बार नहीं उठा है यह मामला 2001  से  ही चला आ रहा है। हाल ही में यह मामला एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट के सामने है कि समलैंगिकता अपराध है या नहीं। धारा 377 समलैंगिकता को अपराध बताता है वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो समलैंगिकता के पक्ष में हैं और उस के पक्ष में अपनी दलीलें पेक्ष कर रहे हैं।

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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के अगुवाई में 5 जजों की बेंच धारा 377 को देख रही है कि दो बालिक लोगों के द्वारा यदि आपसी सहमति से संबंध बनाया  जाता है तो उसे अपराध माना जाए या नहीं।

आज हम आप को बताते वाले हैं कि यह पुरा मामला क्या है और धारा 377 क्या है।

धारा 377

सरकारी वकील रहे (हाई कोर्ट) नवीन शर्मा ने बताया कि जब दो लोगों द्वारा आपस में संबंध बनाया जाता है चाहे वो सहमति से हो या असहमति से, चाहे संबंध बालिक द्वारा बनाए गए हो या नाबालिक द्वारा यह एक अप्राकृतिक संबंध है और इस के लिए दोषी करार दिया जाता है तो 10 साल की सजा हो सकती है। यह एक गैर – जमानती और संज्ञेय अपराध है।

कब उठा पहली बार मामला

दरअसल यह पुरा मामला सामने तब आया जब 2001 में सेक्स वर्कर्स के लिए काम करने वाली एक एनजीओ ‘नाज फाउंडेशन ने एक याचिका दायर कर के सुप्रीम कोर्ट से धारा 377 के ऊपर सवाल उठाए। दायर याचिका में कहा गया कि यदि दो बालिक लोगों द्वारा आपसी सहमति से एकांत में अप्राकृतिक संबंध बनाए जाते हैं तो इसे अपराध की श्रेणी से बाहर रखा जाए। इस के पीछे यह तर्क दिया गया कि धारा 377 व्यक्ति के मूलभूत अधिकारो का हनन करती हैं। व्यक्ति को जीने और आजादी का अधिकार है लेकिन धारा 377 इन अधिकारों में दखल देती है।

यह विवाद तब और बढ़ गया जब 2 मंत्रालय हि आमने-सामने आ गऐ थे। हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को कहा  कि वह एक याचिका दायर करे। तो गृह मंत्रालय ने धारा 377 के खिलाफ दायर याचिका का विरोध किया वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य मंत्रालय ने याचिका का समर्थन किया। बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने 2 जुलाई 2009 को अपना फैसला सुनाया और कहा कि यदि दो व्यस्क लोगों द्वारा आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध बनाए जाते हैं तो धारा 377 के तहत अपराध की श्रेणी से बाहर होगा।

एक बार फिर दी गई फैसले को चुनौती

जब हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया और समलैंगिकता को धारा 377 के बाहर किया तो बीजेपी के नेता बी. पी. सिंघल और कई अन्य लोगों तथा कई संगठनों ने भी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उन के द्वारा यह तर्क दिया गया कि समलैंगिकता एक अनैतिक और अवैध कृत्य है तथा यह भारत की संस्कृति उस के मूल्यों और परंपरा के खिलाफ है।

और अब यह मामला एक बार फिर से तुल पकड़ रहा है धारा 377 का आकलन करने के लिए चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के नेतृत्व में 5 जजों की बेंच जांच कर रही है।

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