International Inequality

International Inequality, developed vs undeveloped, International Relations

International Inequality

 

 

विश्व के देशों में व्यापक रूप से असमानताएँ विद्यमान हैं। विश्व की अर्थव्यवस्थाओं को तीन भागों में विभाजित करके इसका अध्ययन किया जा सकता है – (1) विकसित (2) विकासशील (3) अविकसित ।

दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि विश्व के उत्तरी देश धनवान तथा दक्षिणी देश गरीबों के बीच विश्व दो भागों में विभाजित है।

असमानता के कारण

 प्रौद्योगिकी तथा पूँजी – विकसित एवं विकासशील देशों के बीच यह खाई प्रौद्योगिकी तथा पूँजी की बदौलत पैदा हुई है। दुनिया के विकसित देश प्रौद्योगिकी की दृष्टि से विकसित तथा आर्थिक रूप से सम्पन्न हैं। इसी संपन्नता के कारण विकसित देश न केवल अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर, बल्कि गरीब देशों की अर्थव्यवस्था  संबंधी विभिन्न नीतियों पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए सतत प्रयत्नशील रहे हैं। दुनिया के देशों में अभी भी विकासशील एवं अविकसित देश औद्योगिक दृष्टि से तथा आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं।

साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद तथा नव – औपनिवेशवाद – 

दुनिया के देशों में अभी भी विकासशील एवं अविकसित देश औद्योगिक दृष्टि से तथा आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। वे अब भी विकसित देशों की नव – औपनिवेशिक निर्भरता के अधीन बने हुए हैं। अतीत में भी विकासशील एवं अविकसित देश साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद से पीड़ित थे।

इतिहासिक धरोहर – ये देश  संप्रभुता सम्पन्न स्वतंत्रत इकाई के रूप में घोषित किए जाने पर भी अपने इतिहास की धरोहर के रूप में मिली गरीबी, बेरोजगारी तथा अल्पविकस की अवस्था से पीड़ित हैं।

विकसित देशों का शोषण – विकसित देश आज भी विकासशील देशों का शोषण कर रहे हैं। विकसित देश विदेशी सहायता, बहुराष्ट्रीय निगमों, अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों, अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर नियंत्रण तथा संरक्षणात्मक व्यापार एवं आर्थिक नीतियों जैसी युक्तियों के माध्यम से अल्पविकसित देशों को पीड़ित अवस्था में बने रहने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

पूँजीवादी और उपभोक्तावादी संस्कृति – आज औद्योगिक पूँजीवादी व्यवस्था और इसकी उपभोक्तावादी संस्कृति को दुनिया के उन भागों पर लादने का प्रयास हो रहा है, जहाँ अभी तक पारंपरिक या गैर – पूँजीवादी व्यवस्थाएं थी।

 अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों पर विकसित देशों का वर्चस्व – अन्तर्राष्ट्रीय संगठनो विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना की स्थितियां भी ऐसी थीं कि इन पर विकसित देशों के वर्चस्व की भूमिका को टाला नहीं जा सकता।

अमेरिकी वर्चस्व – रूस और चीन में समाजवादी कही जाने वाली व्यवस्थाओं के ध्वस्त हो जाने के बाद दुनिया में आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभुत्व का केंद्र अमेरिका रह गया।

वीटो का अधिकार – नाटो के माध्यम से संसार में एकमात्र शक्तिशाली सैनिक शक्ति भी यही बच गया। संयुक्त राष्ट्र संघ में रूस और चीन अब भी अपनी वीटो पावर के साथ उपस्थित हैं, लेकिन अब भी वे अमेरिका के मर्जी के खिलाफ वीटो का प्रयोग किसी महत्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय विषय – वस्तु के मुद्दे पर नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे अन्तर्राष्ट्रीय संगठन भी विकसित देशों के हित साधन का औजार बनकर रह गया है।

(दुनिया के कई देशों जैसे-इराक, कोरिया, अरब – इजरायल, युगोस्लाविया या फिर अफगानिस्तान के मामले में अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा कार्रवाई सीधे अमेरिकी नीति के अनुसार की है या अमेरिका के दबाव में आकर किया गया है।) 

वैश्वीकरण –  व्यापार में खुलेपन का आना या संचार माध्यमों का विकास होना तथा वर्तमान में इंटरनेट से ई – कॉमर्स की ओर संक्रमण इसी प्रक्रिया का परिणाम है। हालांकि यहाँ यह भ्रम पैदा होता है कि संसार के लोग आपस में जुड़ रहे हैं और दुनिया एक ‘वैश्विक गांव’ बन गया है। दरअसल इस व्यवस्था में विश्व का एक संपन्न वर्ग ही अपने व्यापारिक हितों के लिए एक दूसरे से जुड़ता है। वहीं एक देश नए संचार माध्यम से संसार से जुड़  समूह अपने ही आसपास के बहुसंख्यक वंचित समूहों से पूरी तरह कट जाते हैं। दुनिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी सूचनाओं से वंचित हैं।

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