J. S. Mill on Liberty

J. S. Mill on Liberty

स्वतंत्रता पर जे. एस.मिल के विचार

जे. एस.मिल (John Stuart Mill) व्यक्तिवादी विद्वान था। उस का मानना था कि एक व्यक्ति हमेशा सुख चाहता हैं और सुख की प्राप्ति के लिए हमेशा प्रयास करता है। वह इस बात में विश्वास रखता था कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के द्वारा ही सामाजिक और राजनीतिक प्रगति हो सकती है, समाज और राजनीतिक विकास के लिए व्यक्ति का स्वतंत्र होना अति आवश्यक है। लेकिन मिल का यह विचार भी नहीं था कि व्यक्ति को पूरी तरह से स्वतंत्रता छोड़ दिया जाए हर कार्य के लिए मिल का स्वतंत्रता से आश्य स्वेच्छाचार या स्वच्छंदता से नहीं था क्योंकि स्वेच्छाचार और स्वच्छंदता नकारात्मक स्वतंत्रता को प्रकट करता है।

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मिल ने स्वतंत्रता की परिभाषा व्यक्ति के कार्यो के अनुसार दी। उन्होंने व्यक्ति के दो प्रकार के कार्य बताएं और व्यक्ति के कार्यो के अनुसार ही स्वतंत्रता की सकारात्मक परिभाषा दी। मिल ने व्यक्ति के दो प्रकार के कार्य बताएं –

(1) वह कार्य जिनका प्रभाव केवल करने वाले अर्थात कर्ता तक सीमित हो।

(2) वह कार्य जिन का प्रभाव करने वाले अर्थात कर्ता के साथ साथ समाज के अन्य लोगों पर भी पड़ता हो।

मिल ने कहा जिन कार्यो कि प्रभाव कर्ता के अलावा समाज के अन्य लोगों पर भी पड़ता हो उन कार्यो के संबंध में व्यक्ति को कभी भी पूर्ण स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिए। जैसे – अश्लील हरकतें करना, शराब पीकर अनाप – शनाप बोलना, चोरी करना। इन कार्यो का समाज के अन्य लोगों पर भी बुरा असर पड़ता है इसलिए इन कार्यो पर आवश्यक रूप से रोक लगाना चाहिए।

वह दूसरे कार्य जिन का प्रभाव केवल करने वाले यानी कर्ता पर पड़ाता हैं उस विषय में मनुष्य को पूर्ण स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। जैसे – एक व्यक्ति क्या खाता – पिता हैं।

वह क्या पढ़ता हैं, कैसे कपड़े पहनता है, कोन सी भाषा बोलता है, किस धर्म को मानता है, कहा रहता है तथा कोन सा व्यापार करता है। यह सारी चीजें व्यक्ति की निजी बातें हैं इस लिए व्यक्ति इन कार्यो के लिए स्वतंत्र हैं और इन कार्यो पर राज्य के द्वारा भी कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए।

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