MED 002 Solved Assignment 2020 hindi

MED 002 SOLVED ASSIGNMENT 2020 HINDI

MED 002 Solved Assignment 2020 hindi

 

MED 002 सतत विकास मुद्दे और चुनौतियां
Solved Assignment 2020
Sustainable Development : Issue and Challenges

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MED 002 Solved Assignment pdf in Hindi Medium 

प्रश्न 1. सतत विकास की अवधारणा को समझाइए। अंतर्पीढीय साम्य (इक्विटी) और न्याय के लिए प्रमुख नियमों की संक्षेप में चर्चा कीजिए।

उत्तर

भूमिका – सतत विकास की अवधारणा 1960 में विकसित हुई, जब लोग पर्यावरण पर औद्योगीकरण के हानिकारक प्रभाव से अवगत हुए। आधुनिक समय में यह एक बहुचर्चित अवधारणा बन चुकी है। सतत विकास सामाजिक – आर्थिक विकास की प्रक्रिया है, जिसमें पृथ्वी की क्षमताओं पर विचार करके विकास की चर्चा की जाती है। प्राकृतिक संसाधनों की समाप्ति तथा उसके कारण आर्थिक क्रियाओं तथा उत्पादन प्रणालियों की गति धीमी होने या बंद होने के भय ने ही सतत विकास जैसी अवधारणा को जन्म दिया। लोगों द्वारा प्रकृति के बहुमूल्य तथा सीमित संसाधनों के लालच एवं दुरुपयोग के परिणामस्वरूप ही इस अवधारणा का विकास हुआ। सतत विकास की कार्यप्रणाली कोयला, तेल तथा जल जैसे संसाधनों के दोहन के लिए उत्पादन तकनीकों, औद्योगिक प्रक्रियाओं तथा विकास की न्यायोचित नीतियों के संबंध में दीर्घकालीन योजना प्रस्तुत करती है।

MED 008 QUESTIONS PAPER 

सतत विकास के परिमाप से अभिप्राय-  उन सिद्धांतों के समावेश से हैं, जिनके माध्यम से (1) सतत विकास की अवधारणा को समझने में सहायता मिलती है,(2) उनसे संबंधित समस्याओं का स्पष्टीकरण होता है, तथा (3) उनके आधार पर सक्रिय नीति सुझाव को अपनाने में सहयोग मिलता है। इन परिमापों में जिन विषयों को शामिल किया गया है, वह है क्षमता तथा अंतर्पीढीय न्याययुक्तता तथा अंतरा लिंग असमानता तथा विविधता।

सतत विकास का अर्थ है, “विकास जो भावी पीढ़ियों की योग्यताओं पर समझौता किए बगैर उनकी अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने, सभी के लिए उन्नत जीवन स्तर, बेहतर रक्षित एवं नियंत्रित पारितंत्र तथा एक अधिक सुरक्षित और अधिक संपन्न भविष्य पाने हेतु वर्तमान की आवश्यकता पूरी करता है।”

जिस तरीके से हम प्रकृति व प्राकृतिक पूंजीगत सेवाओं का मूल्य आँकते हैं और प्राकृतिक परिसंपत्तियों के अवमूल्यन की जिम्मेदारी से बचते हैं, उसका प्रायः अर्थ होता है कि हम स्वयं की उन्नति कर रहे हैं, जबकि सोचते यह कि हमारी अर्थव्यवस्था तरक्की कर रही है। नए उपागम की आवश्यकता है एक समेकित प्रयास की,जो पर्यावरणीय रूप के संदर्भ गतिविधियों की दिशा में उपभोक्ताओं की प्राथमिकता एवं पथ प्रदर्शन करता हो, मांगों के पुनर्गठन पर आधारित हो।

MPS MED 002 SOLVED ASSIGNMENT 2020 

सतत विकास के मूल सिद्धांत निम्नलिखित हैं –

1. विकास का अधिकार अंतर – पुश्तीय समदृष्टि को रखकर एवं पर्यावरण की रक्षा को विकास की प्रक्रिया का अभिन्न अंग मानना चाहिए।

2. सभी राज्यों की यह जिम्मेदारी है कि सभी लोगों की सदा उच्च जीवन गुणवत्ता पर समझौता किए बगैर उत्पादन एवं उपभोग के असतत प्रतिमानों को कम करना चाहिए।

3. आर्थिक वृद्धि सतत विकास से संबंधित हो। राज्य यह सुनिश्चित करे कि वैश्वीकरण के आर्थिक प्रभाव विशेषकर विश्व व्यापार की नीतियां जो गरीब देशों के विरुद्ध विभेदकारी है, सतत विकास के लिए परिवर्तित की जाए।

4. राष्ट्रीय प्राधिकरणों के कुल उत्पादन के हिस्से में पर्यावरण लागतो के अंतर्राष्ट्रीयकारण हेतु कार्य करना चाहिए। पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन राष्ट्रीय आर्थिक नीति का एक अभिन्न हिस्सा होगा।

5. राज्यों के बीच पर्यावरणीय मुद्दों के संबंध में सूचना का आदान-प्रदान जागरूकता पर आधारित होना चाहिए।

अंतर पीढ़ी क्षमता तथा न्याय
(भूमंडलीय क्षेत्रीय तथा देश के स्तर पर)

अंतरपीढ़ी क्षमता से अभिप्राय पृथ्वी के संसाधनों का पीढ़ियों के मध्य है इस प्रकार विचारपूर्ण उपयोग से है जिससे कि वर्तमान पीढ़ी भी इसका उपयोग करें तथा आने वाली पीढ़ी के लिए भी ये कायम रहे। अंतर्पीढीय समता का संबंध निष्पक्षता व न्याय से है। इसका अर्थ एक ऐसे विचारपूर्ण संतुलन से है जिससे हमारी वर्तमान तथा भविष्य की भी आवश्यकताएं भी पूरी हो।

उपभोक्तावाद विश्व गैर सतत क्रियाओं को जन्म देता है, जिसके कारण हमारी आने वाली पीढ़ी के पास अधिक गरीब व प्रदूषित विश्व होगा। अंतर्पीढीय समता से अभिप्राय यह है कि नीतियां इस प्रकार तय की जाए जिसमें हमारी आज की आवश्यकताओं का, हमारी भविष्य की आवश्यकताओं का तथा हमारे बाद विश्व में रहने वालों का बराबर ध्यान रखा गया हो।

अंतर्पीढीय समता, पर्यावरण सुरक्षा, संसाधन उपभोग तथा सामाजिक – आर्थिक विकास से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय कानून का एक अनिवार्य अंग बन गई है। अंतर्पीढीय समता संसाधनों के उपयोग में एक ऐसे संतुलन की मांग करती है जिसमें वर्तमान समाजों की खपत मांगों को पूर्ण किया जा सके तथा भविष्य की पीढ़ियों को भी पर्याप्त संसाधन सुलभ कराए जा सके।

अंतर्पीढीय समता पर चिंतन न करने का एक उल्लेखनीय उदाहरण प्रशांत महासागर के नौरू राज्य का है, जिसके पड़ोसी देश ऑस्ट्रेलिया ने उसका शोषण किया। नौरू में फॉस्फोरस की अधिकता थी, जबकि ऑस्ट्रेलिया की जमीन में फॉस्फोरस की कमी के कारण वहां कृषि उत्पादन बहुत कम था। 1970 के दशक में ऑस्ट्रेलियाई खनिजों ने नौरू सरकार से अनुबंध कर लिया, जिसके परिणाम स्वरूप नौरू के नागरिकों को लगभग एक दशक के लिए भरपूर रोजगार मिला, जिससे उनका जीवन स्तर भी ऊंचा उठा।

किंतु ऑस्ट्रेलियाई खनिक सारे फॉस्फोरस का खनन करने के उपरांत नौरू को छोड़कर चले गए। नौरू के पास धन व रोजगार का अभाव था जिससे वह ना तो आगे बढ़ सका और ना ही पर्याप्त जीवनशैली को कायम रख सका। वहां के नागरिकों ने मादक पदार्थों का प्रयोग करना शुरू कर दिया तथा वहां बड़े-बड़े गुंडों का शासन हो गया।

अंतर्पीढीय समता को वातावरण परिवर्तन अनुबंध क्लाइमेट चेंज कन्वेंशन (सीसीसी) के अनुच्छेद – 3 के महत्वपूर्ण भाग में स्थान दिया गया है। इसमें कहा गया है कि अनुबंधकर्ताओं को मानवता की पीढ़ियों के लाभ समता के आधार पर और अपने साझे तथा विभेदीकृत उत्तरदायित्वों के अनुरूप पर्यावरण व्यवस्था की रक्षा करनी चाहिए।

किंतु इस वक्तव्य में कुछ कमियां हैं जैसे इसमें यह नहीं बताया गया कि पर्यावरण की सुरक्षा कैसे की जाए, वर्तमान में किन उपायों को अपनाया जाए या अपने व्यवहार में कौन से परिवर्तन लाई जाए, जिससे भविष्य की पीढ़ियों के हितों की रक्षा की जा सके। इस संबंध में कोई भी समझौता नहीं हुआ है जिससे राष्ट्रीय पर कोई बंधन लगायें। आने वाली पीढ़ियों के हितों के संरक्षण की रूपरेखा 3 सिद्धांतों की सहायता से बनाई जा सकी है, वे है “विकल्पों का परिरक्षण”, “गुणवत्ता का परीक्षण”, तथा “पहुंच का परिरक्षण”।

इसके लिए कानूनी ढांचे को पूरी तरह से पुनः निर्धारित करने की आवश्यकता है, जिससे वर्तमान में गैर सततशील संसाधन परिरक्षण को प्रोत्साहित किया जा सके। इस प्रकार अंतर्पीढीय समता एक सिद्धांत है जो वर्तमान पीढ़ी की गैर सतत क्रियाओं पर प्रतिबंध लगाता है तथा व्यवसायिक व व्यापारिक नीतियों के निर्माण में प्राकृतिक संसाधनों के दीर्घकालीन मूल्यांकन का सुझाव देता है।

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