MGP 004 Solved Assignment 2020

MGP 004 Solved Assignment 2020

MGP 004 Solved Assignment 2020 

MGP 004 Gandhi’s Political Thought
गाँधी के राजनीतिक विचार
Solved Assignment 2020
31 April 2020 / 30 September 2020

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Title – MGP 004 Gandhi’s Political Thought
गाँधी के राजनीतिक विचार

University – Ignou

Assignment Types – PDF, SOFT COPY /Handwritten on order

Course – MPS (MASTER IN POLITICAL SCIENCE)

Medium / Language – HINDI MEDIUM / ENGLISH MEDIUM BOTH AVAILABLE

Session – JULY 2019, JANUARY 2020

Subjects code – MGP004

Assignment Submission Date – July 2019 session के लिए – 30 April 2020, January 2020 session के लिए – 30 September 2020.

MGP 004 Solved Assignment 2019 – 2020 in hindi medium

Q. 5 साध्य और साधन की महत्ता पर गाँधी के विचारों की परीक्षण कीजिए।

उत्तर –

भूमिका – गाँधी के ज्ञान दर्शन का एक अहम बिंदु साधन और साध्य के बीच संबंधों पर केन्द्रित है और यह केन्द्र है उनके संपूर्ण ज्ञान रूपी इमारत का, तो यह केवल प्रश्न मात्र नहीं है। कर्मो का एक आधार है संघर्षों का जड़ से समाधान, अर्थात संघर्ष के कारण को खत्म करना। संघर्षों के खात्मे में न कोई विजेता होता है और न ही कोई पराजित, जैसा कि युद्ध में या क्रूर शक्ति द्वारा किए समझौते में बल्कि यह दीर्घकालीन शांति स्थापना का खाका उपलब्ध कराता है। जबकि संघर्षों का अंत तो स्थायी शांति स्थापना का उदाहरण है अर्थात शांति का संबंध आंतरिक मन से है और अहिंसक कर्मों से संबंधित हैं और संघर्षों को केवल शांतिपूर्ण ढंग से खत्म करने की प्रतिबद्धता है।

समाज के शांतिपूर्ण विकास के संदर्भ में इस प्रकार अहिंसा का नकारात्मक पक्ष खत्म हो जाता है और सकारात्मक पक्ष की स्थापना होती है। यह एक ऐसे व्यक्तित्व के विकास में सहायता करता है जो संवेदनशील हो तथा दो महत्वपूर्ण कारकों जैसे संवेदना और अहिंसा के बीच की खाई को भरने का काम करें। यह संयोग किसी क्रांतिकारी हिंसा की आवश्यकता को खत्म करता है और साधन और साध्य में निरंतर संबंध स्थापित करता है। साधन और साध्य के बीच का यह महत्वपूर्ण संबंध समझने के लिए, या किसी क्रियाकलाप का इनसे संबंध समझने के लिए आवश्यकता है इसके मूल यानी नैतिकता या सदाचार को समझने की।

संघर्ष और इसके समाधान में साधन और साध्य

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साधन और साध्य के मध्य संबंध गाँधी के सामाजिक दर्शन और संघर्ष समाधान संबंधी विचारों की केन्द्रीय अवधारणा है। गाँधी के लिए दोनों परस्पर संबंधित है क्योंकि साध्य साधन को सार्थक बनाता है और ” एक साध्य जो अन्यायपूर्ण हो और कभी भी उचित साध्य नहीं हो सकता”। सन 1909 में हिन्द – स्वराज में संपादक ने पाठक को जो कि भारत से ब्रिटिश शासन को बलपूर्वक उखाड़ फेंकने के पक्ष में लिखा गया था, उससे बात करते हुए कहा, ” यह सोचना गलत है कि साधन और साध्य में आपसी संबंध नहीं है। ऐसी गलती के कारण धार्मिक लोगों ने भी घृणात्मक अपराध किए हैं। यह बिल्कुल वैसा है कि आप कहें कि एक जहरीला बीज बोकर आप गुलाब का पौधा उगा सकते हैं। अगर मैं समुद्र को पार करना चाहता हूँ तो मुझे नौका की जरूरत पड़ेगी, अगर मैं सोचू कि बैलगाड़ी की सहायता से ऐसा कर सकता हूँ, तो बहुत जल्दी ही दोनों डूब जाएँगे। साधन बीज के समान है और साध्य पेड़ के समान है। साधन और साध्य के बीच भी न खत्म होने वाला वहीं संबंध है जो पेड़ और बीज के बीच में है। मैं सारे दिन शैतान के सामने सिर टिकार लेटा रहूँ और भगवान की उपासना की उपासना की इच्छा करूँ तो व्यर्थ है। हम जैसा बोते हैं बिल्कुल वैसा ही काटते हैं। ” न्याय की प्राप्ति गलत साधनों से नहीं हो सकती है, स्वाधीनता भी गैर – कानूनी रास्तों से नहीं मिल सकती है और शांति युद्ध से नहीं मिल सकती। गाँधी का मानना है कि कर्तव्य और अधिकार के बीच गहरा संबंध है, अत : एक पर बल देना और दूसरे को भूल जाना एक गलत बात है।

गाँधी, कौटिल्य और मैक्यावली के आत्मसंरक्षण तथा मूल कारण के विचार को नकारते हैं जिसमें साध्य साधन को सार्थकता देता है। साधनों के चयन को सिद्धांत की बजाए आवश्यकता के आधार पर सीमित मानना गाँधी के लिए अस्वीकार्य था। मैक्यावली का मानना था कि शक्ति या प्रतिष्ठा पाने के लिए कोई भी साधन सही है क्योंकि उसके बाद उससे भी उच्च साध्य प्राप्त किए जा सकते हैं लेकिन वह यह भूल गए थे कि शक्ति की प्राप्ति और उसका रखरखाव भी एक साध्य बन जाता है।

Solved Assignment 2020

MGPE 008 शांति और संघर्ष समाधान का गाँधीवादी दृष्टिकोणGandhi

MGP 004 Solved Assignment 2020 pdf

साधन और साध्य की पवित्रता

गाँधी न केवल साधन और साध्य की दुविधा को नकारते हैं बल्कि उचित और नैतिक साधनों के प्रयोग पर इस हद तक बल देते हैं कि वे साध्यों की बजाए स्वयं एक संदर्भ बन जाते हैं। साधन और साध्य के बीच का संबंध तकनीक आधारित न होकर नैतिकता पर आधारित है। इसमें कोई भी शुरू में ही निर्धारित कर लेता है कि उसका इच्छित साध्य क्या है और उसे पाने के लिए रास्ते में हर आवश्यक कदम उठाता है। वे हमेशा कहते थे कि गलत रास्तों पर चलकर सही मंजिल नहीं पाई जा सकती है। महान और अच्छे साध्य भी कभी बुरे या अनैतिक साधनों से प्राप्त नहीं किए जा सकते। कर्म के सिद्धांत को मार्गदर्शक मानते हुए गाँधी साधन और साध्य की जैविक अन्तनिर्भरता को रेखांकित करते हैं। वह इस बात पर बल देते हैं कि व्यक्ति का साधन पर नियंत्रण हो सकता है पर साध्य पर नहीं।

गाँधी की साधन और साध्य की अवधारणा को उनके इस आग्रह के प्रकाशन में बेहतर समझा जा सकता है कि हम सभी सापेक्षिक सत्य के धारक हैं और कोई भी संपूर्ण सत्य को जानने का दावा नहीं कर सकता। इस धारण के रूप में हम सभी अपने अपने सत्य को जानते हैं। अतः अलग – अलग लोगों के लिए सत्य अलग – अलग होता है। जैसे कि उन पाँच अंधे लोगों का एक हाथी का विवरण जो अधूरी है क्योंकि कोई भी पूरी तरह से हाथी को नहीं जानता। अगर साध्य को लेकर लोगों में मतभेद हैं तो वह इसलिए है कि मनुष्य सापेक्षिक सत्य की रचना है। सापेक्षिक सत्य और तर्क के सिद्धांत का संबंध सत्य से है और इसी वजह से गाँधी सत्य और अहिंसा को एक – दूसरे से संबंधित मानते हैं। सत्य की खोज करने वाला अहिंसक प्रवृति का होता है। गाँधी की सत्य की अवधारणा जिसमें अहिंसा साधन है ने सत्याग्रह की अवधारणा या प्राधिकार का सक्रिय प्रतिरोध दिया जबकि अहिंसा की अवधारणा ने सत्य को सामूहिक साध्य मानते हुए उन्हें सर्वोदय या अहिंसक समाजवाद के सिद्धांत के निमार्ण के योग्य बनाया।
गाँधी का साधन और साध्य के बीच संबंध का विचार भगवद गीता के निष्काम कर्म से भी प्रभावित है। जब तक कर्म त्याग की भावना से न किया जाए, भविष्य के परिणामों की चिंता बनी रहेगी। वे समझाते हैं, ” यदि हम साधन की शुद्धता के प्रति पूर्ण विश्वास में हैं तो हम एक आस्था के मार्गदर्शन में होंगे जिसमें बड़े से बड़ा भय भी पिघल जाता है। “अलगाव का अर्थ अपने इच्छित साध्यों के प्रति अस्पष्टता नहीं है।

स्वराज की प्राप्ति के लिए साधन के रूप में अहिंसा

गाँधी कहते हैं कि स्वराज एक ऐसा साध्य है जिसकी प्राप्ति सही साधनों के प्रयोग पर ही निर्भर है। वह कहते हैं कि इस बात पर ध्यान दिया जाए कि साधनों का चयन एक दूर की सोच से किया जाए, साधनों के प्रयोग का अन्त स्वराज प्राप्ति के लिए होना चाहिए। एल्डस हक्सले की तरह गाँधी का मानना है कि भ्रष्ट साधन साध्य को भ्रष्ट करने से नहीं चूकते। ताॅलस्टाय की तरह गाँधी मानते हैं कि यदि एक बार हिंसा अहिंसा में प्रवेश करा जाए तो अहिंसा खोखली हो जाती है और आगे के जीवन के लिए मार्गदर्शन बंद हो जाता है। अहिंसा के साधनों के संबंध में गाँधी कहते हैं, “अगर हम पहले इनकी खोज कर लें, तो बाकी सब इससे जुड़ता चला जाएगा। दोनों का मानना है कि अहिंसा कभी भी हिंसक सरकारों या सब युद्धों और दमनकारी संस्थाओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है क्योंकि अहिंसा एक गतिशील बल के रूप में कार्य करती है।

न्यूमैन की तरह गाँधी कहते हैं कि उनके लिए एक कदम ही पर्याप्त है। उनका मानना है कि अगर उचित साधन अपनाए जाएँ तो साध्य की प्राप्ति सुनिश्चित है। वह अहिंसा को हिंसा की बजाय भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अधिक उपयुक्त मानते हैं। गाँधी अहिंसा की बजाय भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अधिक उपयुक्त मानते हैं। गाँधी अहिंसा को हिंसा की बजाए प्राथमिकता देते हैं और हिंसक कर्मों को कायरतापूर्ण अहिंसक कर्मों की तुलना में उचित बतलाते हैं जिसे वह नकारात्मक हिंसा कहते हैं। केवल बल के न प्रयोग करने को ही अहिंसा नहीं कहा जाता। उन्होंने हिंसा को कमजोरी, नैतिक नपुंसकता और दूसरों के विचारों और मतों के प्रति असहनशीलता का परिणाम कहा। वह अहिंसा को एक मूल्य मानते हैं और समाज को संघर्षों के निपटारे के लिए सक्रियता से इसे अपनना चाहिए। शांति केवल अहिंसा से ही संभव है। यह दर्शाता है कि अहिंसा का उपकरण रूप से कोई महत्व नहीं है बल्कि यह एक सकारात्मक तत्व है जिसे गैर – संग्रहणशीलता, गैर – शोषणता और एक समतावादी समाज के रूप में देखा जा सकता है। गाँधी के अनुसार अहिंसा एक अत्यंत करूणामयी भाव है। यह साधन और साध्य के बीच का पुल हैं, क्योंकि एक साधन के रूप में यह अहिंसा रूपी व्यापक साध्य को प्राप्त करने में सहायता करता है, जो सारे संघर्ष समाप्त कर देता है।

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निष्कर्ष :- गाँधी साधन और साध्य के बीच बीज और पेड़ जैसे संबंध को देखते हैं और इसे निकट और अंतरंग संबंध के रूप में रेखांकित करते हैं। जैसे पेड़ बीज में होता है, वैसे ही साध्य साधनों के भीतर छिपा होता है। वह कहते हैं, “मेरे जीवन में साधन और साध्य परस्पर परिवर्तनशील इकाइयाँ हैं। हमारा योजना पर नियंत्रण होता है, जबकि साध्य पर नहीं।” साधन ही सब कुछ हैं। हमारा योजना पर नियंत्रण होता है, जबकि साध्य पर नहीं।” साधन ही सब कुछ है। गाँधी साधन और साध्य को अलग नहीं करते हैं और कहते हैं कि जीवन के सभी क्षेत्रों में, राजनीति में भी हम वहीं काटते हैं, जो हम बोते हैं।

गाँधी इस बात पर भी जोर देते हैं कि अपने साध्य को प्राप्त करने के लिए संयमशील कर्म करने चाहिए और हमारे भीतर एक स्तर तक अलगाव होना चाहिए। अगर प्रयुक्त साधन शुद्ध हैं तो परिणाम को लेकर जो भय है वह उड़ जाएगा। परिणाम के लिए चिंतित न होने का तात्पर्य साध्य के प्रति स्पष्टता का अभाव नहीं है। कारण सच्चा और स्पष्ट होना चाहिए, ताकि साधन भी वैसे ही हों और हमें यह मानना पड़ेगा कि अशुद्ध साधन अशुद्ध साध्यों तक ही ले कर जाते हैं, सत्य को झूठे रास्तों पर चलकर पाया नहीं जा सकता, न्याय को अन्याय से नहीं पाया जा सकता, स्वाधीनता को अत्याचारी ढंग से हासिल नहीं किया जा सकता, समाजवाद कभी दुश्मनी या दमन से साकार नहीं हो सकता। युद्ध कभी भी चिरस्थायी शांति स्थापित नहीं कर सकता। गाँधी स्पष्टतया इस विचार को ठुकराते हैं कि साध्य साधन को सार्थक प्राप्त करते हैं और कहते हैं कि नैतिक साधन स्वयं ही साध्य है क्योंकि गुण स्वयं ही पारितोषिक होता है।

साधन शुद्ध हो, इसके लिए गाँधी कहते हैं कि आत्मा को सभी बुराइयों से दूर होना चाहिए, जिसके लिए उपवास और प्रार्थना की जानी चाहिए। गाँधी संपूर्ण जगत में ईश्वर को पाते हैं अतः साधन की शुद्धता पर बल देते हैं। गाँधी स्वतंत्रता पाने के लिए रक्तपात और हिंसा के बजाय अहिंसा और सत्याग्रह का साधन चुनते हैं। वे व्यक्तिगत चरित्र परिवर्तन पर आधारित समाज परिवर्तन चाहते हैं।

 

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