MGPE 013 Solved Assignment 2020 English

MGPE 013 Sivil Society, Political Regimes And Conflict
नागरिक समाज, राजनीति शासन और संघर्ष
Solved Assignment
31 March 2020 / 30 September 2020

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MGPE 013
नागरिक समाज, राजनीति शासन और संघर्ष
SOLVED ASSIGNMENT 2020 

प्र. 1 नागरिक समाज के प्रारंभिक आधुनिकता की धारणा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर –

भूमिका :- नागरिक समाज की अवधारणा का उदय 1750 से 1850 के मध्य हुआ। प्रारंभ में नागरिक समाज को राज्य का ही पर्याय माना जाता था, परन्तु बाद में राज्य और नागरिक समाज को भिन्न भिन्न अवधारणा माना गया। नागरिक समाज की अवधारणा का जन्म स्वेच्छाचारिता के उन्मूलन के उद्देश्य से हुआ। नागरिक समाज की अवधारणा सबसे पहले अरस्तू के राजनीतिक दर्शन यूनानी शब्द (Politika Koinonia) में देखने को मिलती है। अरस्तू नागरिक समाज को समाज नागरिकों का नैतिक – राजनीतिक समुदाय मानता  है। नागरिक समाज की अवधारणा को हम आधुनिक माना सकते हैं, परन्तु इसका उल्लेख हमें प्राचीन राजनीतिक दर्शन में भी मिलता है। नागरिक समाज को 18वीं शताब्दी की लोकतांत्रिक क्रांति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी माना जाता है। विद्वानों ने भिन्न-भिन्न ढंग से नागरिक समाज को परिभाषित करने का प्रयास किया है इसी कारण नागरिक समाज पर एक सर्वमान्य परिभाषा का अभाव दिखाता है।
राज्य से भिन्न, नागरिक समाज का उदय केवल सामंती समाज के विघटन के साथ ही होता है। राजनीतिक समाज और आत्मिक या आध्यात्मिक समाज का भेद प्रमुखता से तब ध्यान में आया जब सुधार आन्दोलन ने धार्मिक कलह छेड़ दी जिससे प्रोटेस्टैंट मत का जन्म हुआ और खुद ईसाई धर्म की एकता ही भंग हो गई।

नागरिक समाज की प्रारंभिक आधुनिक धारणा : फगर्यसन और स्कॉटिश प्रबोधन

राज्य से भिन्न, नागरिक समाज का उदय केवल सामंती समाज के विघटन के साथ ही होता है। राजनीतिक समाज और आत्मिक या आध्यात्मिक समाज का भेद प्रमुखता से तब ध्यान में आया जब सुधार आन्दोलन ने धार्मिक कलह छेड़ दी जिससे प्रोटेस्टेंट मत का जन्म हुआ और खुद ईसाई धर्म की एकता ही भंग हो गई। टाॅमस हाॅब्स के अनुसार, चर्च – केन्द्रित सत्ता तो शासन, आदेश या दबाव का रूप नहीं बल्कि एक प्रकार का शिक्षण और प्रेरण है। यह राज्य पर दावा नहीं कर सकती, जबकि इसके विपरीत केवल राज्य की क्रियाओं के माध्यम से ही धार्मिक सिद्धांतों को एक राजनीतिक दर्जा हासिल हो सकता है। बहरहाल, वह फिर भी राजनीतिक समाज को नागरिक समाज के समान बनाता है। इसके विपरीत, अरस्तू को दोहराते हुए, लाॅक का कहना है कि राजनीतिक समुदाय कोई विस्तारित परिवार नहीं होता और राजनीतिक शासन भी पैतृक नहीं होता। हाॅब्स और लाॅक दोनों ही व्यक्तिगत और राजनीतिक सत्ता के बीच एक सामाजिक अनुबंध स्थापित करने के नैसर्गिक और तार्किक आधार स्पष्ट करने के लिए मौजूदा नागरिक समाज की विशिष्टताओं को वापस प्रकृति की स्थिति में  ले जाते हैं।

राजनीतिक और सामाजिक के बीच भेद का जन्म

अठारहवीं शताब्दी के अंत और उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में, औद्योगिक और फ्रांसीसी क्रांतियों के बाद, राज्य और समाज का एक और भेद सामने आया। समाज का मतलब वह मौलिक मेल नहीं रह जाता जिसे राज्य स्थापित करता है। नागरिक समाज अब अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं को अपने ही ढंग से पूरा करने के अधिकार का प्रयोग करने वाले व्यक्तियों द्वारा गठित अंत : क्रिया और विनियमय के संपर्क जाल के रूप में उभरना है। चार्ल्स – लूई एस. माॅन्टेस्क्यू (1689 – 1755) का कहना है कि वाणिज्यवाद मनुष्यों को उनके पूर्वाग्रहों से मुक्त करता है जो उनकी वास्तविक आवश्यकताओं को छिपाते हैं। एक बार जो मनुष्य अपनी वास्तविक आवश्यकता को समक्ष भी लें तो फिर
उन्हें उनके “मानवता” – बोध का पता चल जाएगा और
वे पहले के धार्मिक, जातीय और राष्ट्रीय संप्रदायवाद को पीछे छोड़ देंगे। एक बार बस वे समग्र खुशहाली की ओर ले जाने वाले शांतिपूर्ण व्यापार के आकर्षण को समझ ले तो फिर उन्हें सैनिक अभियानों और युद्ध के खतरों से चिढ़ हो जाएगी। वे राष्ट्रीय विविधता और व्यक्तिगत विशिष्टता या अनन्यता को भी समझने – सराहने लग जाएँगे। वाणिज्य तो मितव्ययता, बचत, संयम, कार्य, विवेक, शांति,व्यवस्था और शासन, और सबसे अहम तो समुचित न्यायिक समाधान की भावना लेकर आता है जिससे खुले आम डकैती और दूसरों की खातिर अपने हितों की उपेक्षा के बीच एक संतुलित बनता है।

डेविड हयूम (1711 – 76) ने अनुबंध को नहीं बल्कि हित को वह कारक माना है जो व्यक्ति को समाज से जोड़ता है। ऐडम स्मिथ ने अपने समकालीनों – ह्यूम, ऐडम फगर्यूसन (1723 – 1816) और जाॅन मिलर (1735 – 1801) – के समान वाणिज्य और परस्पर सहयोग से मिलने वाले लाभों को समाज – निर्माण का आधार माना है। केवल स्वहित या स्वार्थ को ही नहीं बल्कि संवेगों के विकास, तार्किक चरित्र और व्यक्तियों में होने वाले झगड़ों को भी यहाँ ध्यान में रखना होगा। नागरिक समाज का गठन केवल विनिमय की भौतिक इच्छा से नहीं बल्कि अनुबंध से भी होता है जिसके लिए विश्वास और न्याय  की आवश्यकता होती है। स्कॉटिश प्रबोधन के इन चिंतकों ने, व्यापार और विनिर्माण के विस्तार होते भौतिक क्षेत्र के रूप में, नागरिक समाज का एक नया वर्णन प्रस्तुत किया है, और नागरिक समाज की उस राजनीतिक धारणा और आर्थिक व्यवस्था की उस पारंपरिक अवधारणा को तोड़ा है जिसे सामाजिक अनुबंध चिंतन मानते थे। उनकी दृष्टि में आर्थिक व्यवस्था अब केवल समाज का और उस समय समाज का एक अनिवार्य तत्व बन गई है जो व्यापार और विनिमय, बाजार और श्रम – विभाजन के विस्तार से लाभ लेता है। यह विचार पडुआ के मार्सिलियस की रचनाओं से आया है, जिसके अनुसार भौतिक शांति से आर्थिक और सामाजिक लाभों का आदान – प्रदान संभव होता है। वह परिवार से राज्य तक के विकास को गतिविधियों के बढ़ते विशेषीकरण और विभेदन का परिणाम मानता है, जिनका सामान्य लक्ष्य, “जीवन के लिए और उत्तम जीवन के लिए भी” आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति है।

फगर्यूसन के ऐन ऎसे आॅन दी हिस्ट्री आॅफ सिविल सोसाइटी में स्कॉटिश प्रबोधन के आम ढाँचे के अंतर्गत नागरिक समाज का अत्यंत सारगर्भित विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। फगर्यूसन के अनुसार, “नागरिक समाज ऐसा जीवन – क्षेत्र नहीं है जो राज्य से जुदा हो, वास्तव में, दोनों एक समान है। नागरिक समाज एक प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था है जो, नियमित हुकूमत, कानून और सशक्त सैनिक प्रतिरक्षा के माध्यम से, अपनी यांत्रिक और वाणिज्य कलाओं को, और अपनी सांस्कृतिक उपलब्धियों और जनभावना के बोध को भी, बचाती और निखारती हैं ”। कानून के आधुनिक विभाजन को वह जन – भावना को भ्रष्ट करने वाला मानता है, यह विचार उसे नागरिक मानवतावाद की पुरानी परंपरा से जोड़ता है। जन – भावना के ह्रास से नागरिकों का सत्ता से संदेह पूरा होता है और इस प्रकार स्वेच्छाचारी शासन का मार्ग प्रशस्त होता है। नागरिक समाज जब जनभावना को नष्ट कर देती है तो उससे राज्य की ताकत का दायरा बढ़ जाता है और जनता नागरिक व्यवस्था और शांति की अभ्यस्त हो जाती है। नागरिक समाज एक पेशेवर फौज को भी स्थापित करती है जिससे सैनिक ताकत कि नागरिक समाज के भ्रष्ट नागरिक किस प्रकार भ्रष्टाचार या गहरे पैनी स्वेच्छाचारिता से छुटकारा पा सकते हैं। इस दुविधा के लिए कि आधुनिक नागरिक समाज को एक संप्रभु केन्द्रीकृत संवैधानिक राज्य की आवश्यकता होती है जो वाणिज्य और विनिर्माण के साथ मिलकर समाज के बंधनों को तोड़ता है और नागरिकों की स्वतंत्र समितियों की क्षमता और नागरिक स्वतंत्रताओं को खतरे में डालता है, इस दुविधा के लिए फगर्यूसन ने नागरिकों की समितियों को मजबूत करने का सुझाव दिया है – चाहे वे जूतियों में हो, या नागरिक सेवाओं में हों या फिर नागरिक समाज में। अरस्तू के मत को दोहराते हुए, फगर्यूसन कहता है कि मनुष्य अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन तब करते हैं जब वे सामाजिक समूहों में होते हैं। “समाज की अनुप्राणित भावना के प्रभाव में”, मानव जीवन सर्वाधिक सुखी और स्वतंत्र होता है। दिलचस्प बात यह है कि वह जन – भावनायुक्त संवैधानिक राजतंत्र को सर्वोत्तम मानता है। इस प्रकार की संरचना में जोर नागरिक समाज और राज्य के विभिन्न क्षेत्रों पर होता है, पर ये क्षेत्र एक – दूसरे के विरोधी न होकर पूरक होते हैं। यद्यपि, परवर्ती संरचना में इस संरचना का पूर्ण निषेध देखने को मिलता है।

निष्कर्ष :- राज्य संबंधी अधिकांश अवधारणाएँ राज्य और नागरिक समाज के भेद या अंतर को स्वीकार करती है, सिवाय सर्वाधिकारवाद के जिसका उदय बीसवीं शताब्दी की पहली चौथाई में हुआ और जो केवल राज्य और समाज के भेद को ही खारिज नही करता बल्कि निजी और सार्वजनिक और राज्य और राष्ट्र के अंतर को भी निषेध करता है। सर्वाधिकार राज्य को राष्ट्र में मिला देता है और राज्य को राष्ट्र की एकमात्र और संपूर्ण अभिव्यक्ति का रूप देता है। यह राज्य को एक पार्टी और एक पितृत्वादी नेता के अधीन रखता है। दर्शन के स्तर पर मार्क्सवाद और अराजकतावाद जेसी कुछ विचारधाराएँ यह मानते हैं कि अंत में राज्य का लोप हो जाएगा। फ्रेडरिक आॅगस्ट वाॅन हायेक जैसों के उदारवाद के आमूल परिवर्तित संस्करणों में यह कहा गया है कि समाज तो सहजता का प्रतिनिधित्व करता है जबकि राज्य दमन का प्रतीक है और इसलिए इसके दायरे की कम से कम करने की आवश्यकता है।

प्र. 4 नागरिक समाज के तत्वों का परीक्षण कीजिए।

उत्तर
भूमिका :- नागरिक समाज का संबंध मानव जीवन के उन पहलुओं से है, जो राज्य और सरकार के दायरे में नहीं आते। यह माना जाता है कि राजनीति सत्ता तथा नागरिक समाज एक – दूसरे के बिना नहीं चल सकते। नागरिक समाज को समझने के लिए इसके तत्वों को समझना आवश्यक है। नागरिक समाज का संबंध आर्थिक सम्बन्धों, पारिवारिक ढांचों, धार्मिक संस्थाओं तथा सांस्कृतिक संगठनों से है। अनेक विद्वानों ने राज्य और नागरिक समाज को ऐसे साधन के रूप में देखा है, जो समाज में राजनीति की भूमिका को कम करता है, तो किसी ने नागरिक समाज को अत्याचारी बाजार के विरोध में एकमात्र विकल्प माना है। कुछ विद्वान राज्य और नागरिक समाज को एक ही मानते हैं। उनका तर्क है कि राज्य तो समाज का ही एक हिस्सा है।

यह लेख नागरिक समाज के तत्वों से सम्बन्धित है। इस लेख के अन्तर्गत नागरिक समाज की अवधारणा की उत्पत्ति, ग्रामस्की का मौलिक योगदान, क्रोंचे का प्रभाव, नागरिक समाज के विषय, राज्य कि सिद्धांत, राजनीति की सापेक्ष स्वायत्तता, बुद्धिजीवियों की भूमिका और प्रधानता, फासीवाद का विश्लेषण तथा द्वितीय विश्व युद्धोतर बहस आदि के बारे में भी चर्चा करी है।

नागरिक समाज की अवधारणा की उत्पत्ति

नागरिक समाज सम्बन्धी विचार स्कॉटिश प्रबोधन की देन है। फगर्यूसन ने नागरिक समाज सम्बन्धी विचारों की महता स्थापित की। प्रारंभ में नागरिक समाज सम्बन्धी विचारों की महता स्थापित की। प्रारंभ में नागरिक समाज संबंधी विचार अर्थशास्त्र से संबंधित थे। राजनीति से नागरिक समाज का संबंध केवल राज्य की गतिविधियों को प्रतिबन्धत करने तक सीमित था। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में नागरिक समाज की अवधारणा विकसित होकर एक सशक्त रूप धारण कर चुकी थी। इस संदर्भ में हीगल के प्रयास बहुत महत्वपूर्ण थे। हीगल ने एक नागरिक के जीवन को तीन भागों में बाँटा है –
1.परिवार, 2. नागरिक समाज तथा 3. राज्य।

मार्क्स तथा एंगेल्स ने हीगल के इस वर्गीकरण को अस्वीकार कर दिया। मार्क्स के अनुसार शासक वर्ग का शासन पाश्विक शक्ति के प्रयोग की अपेक्षा राज्य के वैचारिक तंत्र को नियंत्रित करने से अधिक स्थायी रह सकता है। मार्क्स ने राजनीतिक प्रक्रिया में उस विचारधारा का उल्लेख किया है, जिसमें शासक वर्ग लोगों के बीच मिथ्या चेतना प्रसारित कर शासन करता है तथा अपने मूल्यों एवं नियमों को लोगों पर लादने का प्रयास करता है। मार्क्स का उद्देश्य इस मिथ्या चेतना को सच्ची चेतना में बदलना था। इस समस्या ने तब और गंभीर रूप धारण कर लिया, जब 1848 ई. में यूरोप की असफल क्रांति के संदर्भ में मार्क्स ने राज्य का सापेक्ष स्वायत्तता का सिद्धांत विकसित किया। मार्क्स ने नागरिक समाज के सिद्धांत को विकसित नहीं किया, बल्कि इसे विकसित करने का कार्य 20वीं शताब्दी के परवर्ती मार्क्सवादियों पर छोड़ दिया गया।

ग्राम्सकी का मौलिक योगदान

ग्राम्सकी (1887 – 1937) के राजनीतिक चिंतन में नागरिक समाज की अवधारणा एक प्रमुख अवधारणा के रूप में विद्यमान है। 20 वीं शताब्दी में नागरिक समाज की अवधारणा पर सबसे अधिक ध्यान ग्राम्सकी ने ही दिया। ग्राम्सकी का विचार था कि मार्क्सवादी क्रांतिकारी कार्यनीति का विश्लेषण एकपक्षीय आधार पर नहीं, बल्कि एक ऐसे आधार पर करना होगा, जिसमें आर्थिक विकास के चरण, राजनीतिक संस्कृति, आर्थिक तथा राजनीतिक स्वाधीनता जैसे पहलू सम्मलित हों। जब ग्राम्सकी ने उस प्रक्रिया का विश्लेषण किया, जिससे सर्वहारा वर्ग पश्चिम में प्रमुखता हासिल कर सकता था, तो इसके परिणामस्वरूप ग्राम्सकी सोवियत संघ तथा पश्चिम की तुलना करने की ओर उद्धत हुआ। ग्राम्सकी ने इस वाक्य को भी खारिज कर दिया कि “राज्य सब कुछ था तथा नागरिक समाज कुछ भी नहीं था।” ग्राम्सकी के अनुसार पश्चिमी यूरोप के विकसित क्षेत्रों में एक सशक्त एवं मजबूत नागरिक समाज की उपस्थिति है। मार्क्सवादी विश्लेषण में नागरिक समाज को निरूपण करने में क्रोंचे ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

क्रोंचे का प्रभाव

20वीं शताब्दी के प्रारंभ में इतालवी बौद्धिक परंपरा में क्रोंचे (1866 – 1852) का प्रभाव बहुत महत्वपूर्ण रहा। क्रोंचे की तुलना हीगल से की गयी। क्रोंचे ने हीगल एवं मार्क्स दोनों से ही सीखा, परन्तु वह इनका आलोचना भी था। हीगल की ही तरह क्रोंचे भी मानव भावना के सर्वोच्च महत्व पर बल देता था। क्रोंचे ने मार्क्सवादी को साधारण सिद्धांत बताते हुए उसे त्याग दिया, परन्तु बुद्धिजीवियों ने क्रोंचे के लौकिकवाद तथा प्रत्यक्षवाद की भी आलोचना की। क्रोंचे ने इटली में मुसोलिनी का भी समर्थन किया। क्रोंचे जाॅर्जेज सोरेल (1847 – 1992) का भी सहयोग रहा, जिससे वामपंथ के प्रति उसका झुकाव स्पष्ट होता है।

ग्रामस्की की दार्शनिक टिप्पणीयों में क्रोंचेवादी दर्शन की मार्क्सवाद के परिप्रेक्ष्य में घोर आलोचना मिलता है। ग्राम्सकी ने क्रोंचे को आॅइगेन वाॅन डयूरिंग की भूमिका में रखा है, जिसे नष्ट किया जाना चाहिए। ग्रामस्की ने क्रोंचे की तुलना हीगल से की है। ग्राम्सकी क्रोंचे के लिखे एक निबंध से अत्यधिक प्रभावित हुआ था, जिसमें राजनीति के सन्दर्भ में मैकियावेली की विचारधारा का समर्थन किया गया था। इस निबंध को इटली के प्रसिद्ध चिन्तकों विलफेडो पारेटो (1848 – 1923) और गाएतानो मोस्का ने अत्यधिक लोकप्रिय बनाया था। सर्वसम्मति और बल, स्वतंत्रता, प्राधिकार एवं सत्ता के सन्दर्भ में दोनों ही विद्वानों के विचार समान थे।

नागरिक समाज के विषय में

ग्राम्सकी के अनुसार नागरिक समाज का संबंध अधिरचनागत क्षेत्र से है। इसके लिए हम दो अधिरचनागत स्तरों को नियमित कर सकते हैं – पहला नागरिक समाज तथा दूसरा राजनीतिक समाज। ये दोनों स्तर प्रधानता की क्रिया से सम्बद्ध होते हैं। ग्रामस्की के अनुसार मध्य युग में चर्च ही नागरिक समाज था, जिसका अपना कोई संगठन नहीं था, बल्कि वह धार्मिक संगठन को ही अपना संगठन मानता था। ग्रामस्की के अनुसार नागरिक समाज में भौतिक संबंधों के अलावा वैचारिक तथा सांस्कृतिक सम्बन्ध भी आते हैं। ग्राम्सकी ने अपनी नागरिक समाज सम्बन्धी धारणा हीगल से ली है।

ग्राम्सकी ने अपनी रचना ‘पाॅस्ट एंड प्रजेंड, में नागरिक समाज के अर्थ यह बताया है “नागरिक समाज में राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रधानता है तथा इसका प्रयोग एक सामाजिक समूह पूरे समाज पर नैतिक तत्व की तरह करता है।” इस सम्बन्ध में दो बातें महत्वपूर्ण हैं – ग्रामस्की की अवधारणा हीगल से ली गई है तथा ग्रामस्की की दृष्टि में हीगल की नागरिक समाज संबंधी अवधारणा अधिरचनागत है। ग्राम्सकी की नागरिक समाज कि अवधारणा में राज्य और अर्थव्यवस्था भी शामिल हैं। ग्राम्सकी का नागरिक समाज मार्क्स के नागरिक समाज से भिन्न है।
ग्राम्सकी ने राज्य शब्द का प्रयोग राजनीतिक और नागरिक समाज के बीच सन्तुलन के रूप में किया गया है। ग्राम्सकी के अनुसार पूँजीवादी देशों में राजनीतिक सत्ता का स्वरूप व्यवस्था को निर्धारित करता है। ग्राम्सकी ने राज्य को जल, दमन के रूप में परिभाषित किया है, जिसमें नागरिक समाज अपनी सहमति प्रदान करता है। मार्क्स राज्य और नागरिक समाज को अलग – अलग मानता है जबकि ग्राम्सकी मानता है कि राज्य की अवधारणा में नागरिक समाज भी शामिल हैं। ग्राम्सकी के अनुसार राज्य नैतिक कार्य भी करता है, क्योंकि यह आर्थिक क्षेत्र को प्रभावित करता है। ग्राम्सकी कानून की अवधारणा को विस्तृत करने के पक्ष में थे।
ग्राम्सकी ने राज्य में नागरिक समाज तथा राजनीतिक समाज दोनों को शामिल बताया। ग्रामस्की के अनुसार राज्य और नागरिक समाज एक ही है। ग्राम्सकी ने राज्य, नागरिक समाज तथा राजनीतिक समाज। 1931 में ग्रामस्की ने कहा था कि नागरिक समाज का अध्ययन राज्य के कुछ निर्धारक तत्वों की ओर ले जाता है, जिसे राजनीतिक समाज कहते हैं।

राज्य का सिद्धांत

ग्राम्सकी के राज्य सिद्धांत का विकास राज्य और नागरिक समाज के संबंध कि धारणा से हुआ है। मार्क्स ने जहाँ आर्थिक संबंधों पर बल दिया है वहीं ग्राम्सकी ने अधिरचना पर जोर दिया है। वर्चस्वशाली वर्ग की प्रधानता दमन के माध्यम से नहीं, बल्कि नागरिक समाज के माध्यम से कार्यान्वित होती है, परन्तु नागरिक समाज की प्रधानता सभी समाजों में एक समान नहीं होती है। ग्रामस्की ने कहा है कि “रूस में राज्य ही सब कुछ था नागरिक समाज तो आदिकालीन था।” ग्राम्सकी के अनुसार पश्चिम में जब राज्य अस्थिर हुआ तो नागरिक समाज का मजबूत ढाँचा तुरन्त प्रकट हो गया।

राजनीति की सापेक्ष स्वायत्तता

ग्राम्सकी ने अर्थशास्त्र तथा राजनीति के संबंधों तथा राज्य के स्वरूप का विश्लेषण किया है। इतालवी समाज के संघर्षों को समाप्त करने में फासीवाद पूर्ण रूप से सफल नहीं हो पाया। ग्राम्सकी के अनुसार राजनीति की स्वायत्तता को अर्थशास्त्र, नैतिकता तथा धर्म से अलग देखना चाहिए। ग्रामस्की की दृष्टि में राजनीतिक गतिविधि एक उत्कृष्ट मानव गतिविधि है। ग्राम्सकी ने मैकियावेली के राजनीतिक सिद्धांतों को समझने का खूब प्रयास किया है। ग्राम्सकी ने समकालीन स्थिति का विश्लेषण किया है। ग्राम्सकी की दृष्टि में मैकियावेली की महानता इस बात में है कि उसने राजनीति को आचार – नीति से अलग बताया है। ग्राम्सकी की दृष्टि में ‘आधुनिक राजकुमार’ (The Morden Prince) एक पार्टी ही है। यह समाज का एक जटिल तत्व है। ग्राम्सकी यह मानता है कि आर्थिक और राजनीतिक कारक एक – दूसरे से जुड़े होते हैं। ग्रामस्की राजनीतिक घटनाक्रम की स्वतंत्र विशेषताएँ मानता है। ग्राम्सकी राजनीतिक घटनाक्रम की स्वतंत्र विशेषताएँ मानता है। फासीवाद के सन्दर्भ में ग्रामस्की यह मानता है कि इसे आन्तरिक एवं बाहरी दोनों स्तरों पर अत्यधिक स्वायत्तता मिली हुई है। ग्राम्सकी को यह विश्वास था कि इटली में फासीवाद अनिश्चित काल तक जारी नहीं रह पायेगा। ग्राम्सकी के सापेक्ष स्वायत्तता के सिद्धांत की पुष्टि चार दशक बाद पूलनजास ने की थी।

प्र. 5 भारत में शांति आंदोलन के सिद्धांत, विकास और प्रकारों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –
भूमिका – शांति की स्थापना के लिए शान्ति आन्दोलन चलाये जाते हैं। भारत में शान्ति आन्दोलन पर्याप्त लोकप्रिय रहे हैं। शान्ति आन्दोलन शान्ति एवं अंहिसा के सन्देश को जन – सामान्य तक पहुँचाते हैं। शान्ति आन्दोलनों की महत्ता इस तथ्य से प्रकट होती है कि वर्तमान में मानव ने ऐसे विनाशकारी हथियारों का निर्माण कर लिया है, जिनसे सम्पूर्ण पृथ्वी तथा मानव जाति को नष्ट किया जा सकता है। ऐसे में शान्ति की स्थापना पृथ्वी तथा मानव जाति को बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। यह कदम शान्ति आन्दोलनों द्वारा उठाया जा रहा है, परन्तु शान्ति स्थापना के मार्ग में अनेक बाधाएं भी विद्यमान है। भारत जैसे देशों में जहाँ परमाणु हथियार, परमाणु कार्यक्रम को शान्ति के खतरे के रूप में देखा जाता है, वहीं सामाजिक – आर्थिक विभाजनों को भी शान्ति के लिए खतरा माना जाता है। प्रस्तुत लेख भारत में शान्ति आन्दोलनों से सम्बन्धित हैं। इस में हम शान्ति आन्दोलनों की समझ, शान्ति आन्दोलनों के प्रकार, शान्ति आन्दोलनों की उत्पत्ति और विकास के मुद्दे पर चर्चा हैं।

शान्ति आन्दोलन का सिद्धांत
। शान्ति आन्दोलन एक नया सामाजिक आन्दोलन होता है, जिसका लक्ष्य है उन नीतियों तथा परियोजनाओं के पक्ष में जनसमर्थन तैयार करना, जो शान्ति के लिए खतरा उत्पन्न कर सकती है। शान्ति आन्दोलनों का उदय द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ। इन आन्दोलनों का उदय शान्ति की नीतियों तथा मुद्दों पर काम करने के लिए हुआ है। शान्ति आन्दोलनों को प्रकार के छतरी आन्दोलन माना जाता है, क्योंकि ये अन्य सामाजिक आन्दोलनों को भी अपने में समेटे रहते हैं। शान्ति की संकल्पना संकीर्ण अर्थ में नहीं होनी चाहिए, बल्कि एक व्यापक अर्थ में होनी चाहिए, जिसमें निम्नलिखित शामिल हों – जीविका का साधन, हिंसा से मुक्ति, प्राकृतिक संसाधनों तक सभी की पहुँच, सांस्कृतिक स्वायत्तता तथा शान्तिपूर्ण जीवन को खतरे में डालने वाली सभी नीतियों से स्वतंत्रता।
शान्ति आन्दोलनों का प्रमुख उद्देश्य यही होता है कि लोगों को हिंसा एवं परेशानी से बचाया जाये तथा एक शान्तिपूर्ण जीवन जीया जाये, इसलिए शांति आन्दोलनों के सन्दर्भ में सुरक्षा का विचार ‘मानव सुरक्षा’ की अवधारणा तक जाता है। ने सामाजिक आन्दोलनों की प्रकृति शान्ति आन्दोलनों की प्रकृति के ही समान दिखाई देती है। शान्ति आन्दोलन किसी मुद्दे के खिलाफ लोगों के गुस्से का अस्थायी इजहार नहीं होते हैं, बल्कि वे ऐसी किसी परियोजना, कार्य, विचार या मुद्दे के खिलाफ संगठित विरोधी होते हैं, जिससे शान्ति भंग हो सकती है। ये आन्दोलन या विरोध शान्तिपूर्ण साधनों, कार्यनीतियों तथा युक्तियों का प्रयोग करते हैं। इनका उद्देश्य लोगों को समझना तथा उन्हें एकजुट करना होता है।

शान्ति आन्दोलनों के प्रकार

विद्वानों ने भारत में शान्ति आन्दोलनों को दो भागों में विभाजित किया है। पहले भाग में गाँधीवादी विद्वान हैं, जो गाँधीवादी चिन्तन तथा शान्ति और विकास के लिए अहिंसक नजरिये का समर्थन करते हैं। गाँधीवादी शान्ति आन्दोलन को देश में सभी जगह गाँधी आश्रमों ने पहुँचाया है, जिनकी स्थापना गाँधीवादियों ने अपने आवास और कार्यकलाप वाले क्षेत्रों में की है। ये आश्रम उन लोगों के लिए शान्ति की गतिविधियों के केन्द्र हैं, जिनकी आस्था गाँधीवादी चिन्तन में है। शान्ति आन्दोलनों के दूसरे वर्ग में उन स्वायत्त आन्दोलनों को शामिल किया जाता है, जो लोगों के लिए शान्तिपूर्ण गरिमामय जीवन स्थापित करने का उद्देश्य लेकर विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। इस वर्ग में पारंपरिक सामाजिक आन्दोलन तथा ने सामाजिक आन्दोलन दोनों ही आ जाते हैं। ये आन्दोलन एक अकेले मुद्दे वाले आन्दोलन भी हो सकते हैं, परन्तु ये आन्दोलन सामाजिक आन्दोलन के उद्देश्य से बिल्कुल अलग नहीं होते हैं। भारत में नकारात्मक विकास की समस्या सैन्यीकरण तथा दिग्भ्रमित विकास की समस्याओं से संबंधित हैं। शान्ति आन्दोलनों ने एक – दूसरे का समर्थन करने के आलावा आन्दोलन को मजबूती देने के लिए साझा मोर्चा भी बनाया है।

शान्ति आन्दोलनों की उत्पत्ति और उदविकास

भारत में हमेशा से ही शान्ति का पक्षधर रहा है। बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध ने भी शान्ति एवं सत्य की खोज के लिए सांसारिक सुखों एवं राजसी सुख त्याग दिये थे। मौर्य सम्राट अशोक ने भी साम्राज्यवादी युग में युद्ध के स्थान पर शान्ति को अपनाया। अशोक ने शान्ति एवं सदभाव के लिए अपने दूत विदेशों में भी भेजे। भारतीय धर्मों, भारतीय साहित्य तथा भारतीय सामाजिक व्यवस्था में भी शान्ति के महत्व को रेखांकित किया गया है। आधुनिक भारत में शान्ति आन्दोलनों की जड़ें राष्ट्रीय आन्दोलन तक जाती है। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्य धारा आमतौर पर शान्तिपूर्ण ही बनी रही, परन्तु कुछ युवा राष्ट्रवादियों ने हिंसा एवं हथियारों के माध्यम से भी स्वतंत्रता प्राप्त करने का प्रयास किया। इसी कारण राष्ट्रीय संघर्ष में हिंसा को भी स्थान मिला। गाँधीजी ने शान्तिपूर्ण राष्ट्रीय आन्दोलन चलाने की प्रक्रिया में अहिंसा तथा सत्याग्रह को अनिवार्य बना दिया। गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन तथा सविनय अवज्ञा आन्दोलन जैसे शान्ति आन्दोलन अंग्रेजों के खिलाफ शुरू किये। गाँधीजी द्वारा प्रारंभ किये गये शान्ति आन्दोलन को आजादी दिलाने के लिए दीर्घकाल से चलाए गये सिलसिलेवार कदम थे। शान्ति आन्दोलनों के मध्य में गाँधीजी ने रचनात्मक कार्यक्रमों को चलाया, जिनका उद्देश्य था स्वराज की प्राप्ति के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रायस करना। स्वाधीन भारत के प्रारंभिक वर्षों में रचनात्मक कार्यक्रम शान्ति आन्दोलनों की खासियत बन गये थे। आजादी के बाद देश में शान्ति आन्दोलनों की दिशा रचनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से गाँधीजी के सपने को साकार करने की ओर मुड़ गई। आजादी के बाद शान्ति आन्दोलनों का केन्द्र सामाजिक – आर्थिक पुनर्निर्माण बन गया।

शान्ति आन्दोलनों का विकास
भारत में 1970 के दशक के उत्तरार्ध में शान्ति आन्दोलनों का विस्तार हुआ। इस दशक में शान्ति आन्दोलनों को जिस मुद्दे ने राह दिखाई, वह मुद्दा था, परमाणु ऊर्जा तथा परमाणु शस्त्रीकरण का मुद्दा। आजादी के बाद भारत ने अब आर्थिक विकास की ओर कदम बढ़ाये तो उसे ऊर्जा की कमी झेलनी पड़ी। नीति – निर्माताओं ने यह विचार किया कि ऊर्जा की कमी को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा का प्रयोग किया जाये। 1962 में परमाणु ऊर्जा अधिनियम पारित किया गया। इसने ऊर्जा के रूप में परमाणु ऊर्जा के उपयोग का रास्ता साफ कर दिया, परन्तु शान्ति कार्यकर्ताओं ने इसका समर्थन नहीं किया। वे हिरोशिमा तथा नागासाकी की तबाही से भली – भाँति परिचित थे। शान्ति कार्यकर्ताओं ने यह माना कि परमाणु ऊर्जा बिजली का एक सुरक्षित विकल्प नहीं हो सकता। 1974 में राजस्थान के पोखरण में भारत ने अपना परमाणु परीक्षण किया। इसके साथ ही भारत में परमाणु ऊर्जा के शान्तिपूर्ण कार्यक्रम का सैन्यीकरण हो गया। अब शान्ति कार्यकर्ताओं को यह विश्वास हो गया कि भारत का परमाणु कार्यक्रम ऊर्जा की पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि सैनिक उद्देश्यों के लिए है। परमाणु ऊर्जा के विरोध में अदम्य मोर्चो का गठन किया गया। परमाणु ऊर्जा को शान्ति के लिए खतरा माना गया। कुछ शान्ति संगठनों ने परमाणु ऊर्जा के खतरों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए प्रयास आरंभ कर दिये। इन संगठनों में प्रमुख थे – COSNUP (Committee for Sane Nuclear Policy), NONE (Network to Oust Nuclear Energy), CANE (Citizens Against Nuclear Energy), GROUND (Group for Nuclear Disarmament), Media Collective, National Association of India Doctors for the Prevention of Nuclear War तथा अणु ऊर्जा जाग्रति।

भारत में महिला आन्दोलन भी शान्ति आन्दोलनों का एक हिस्सा बन गया। महिला आन्दोलनों को 1970 के दशक में प्रमुखता मिली। संयुक्त राष्ट्र ने 1970 के दशक को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दशक घोषित कर दिया। इसके कारण सरकारी संगठन तथा गैर – सरकारी संगठन दोनों ने ही महिलाओं से सम्बन्धित मुद्दों को प्राथमिकता दी। सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं के दायरे में ही महिलाओं से सम्बन्धित कार्यक्रम तथा नीतियाँ बनाई। कुछ प्रमुख विवादित मुद्दों को भी महिला आन्दोलनों में जगह मिली। उत्तर प्रदेश का चिपको आन्दोलन, 1970 के दशक का महंगाई विरोधी आन्दोलन, गुजरात में सेवा की पहल, महाराष्ट्र के ठाणे जिले में पानी के लिए वसई – विरार संघर्ष जैसे आन्दोलन भोजन, पानी, गरिमामय जीवन, स्व – रोजगार तथा जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं की सस्ती उपलब्धता जैसे मुद्दों पर ही केन्द्रित थे। इन महिला आन्दोलनों ने अपनी गतिविधियों को गैर – राजनीतिक मुद्दों तक ही सीमित रखा। जब महिला समूहों को यह प्रतीत हुआ कि राजनीतिक निर्णय करने की प्रक्रिया में भागीदारी के बिना महिला सशक्तीकरण नहीं हो सकता तो उन्होंने इस मुद्दे पर भी ध्यान केन्द्रित किया। 1990 के दशक तक महिला आन्दोलन ने राजनीतिक निर्णय करने की प्रक्रिया में महिलाओं की उचित भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आवाज उठानी शुरू कर दी।
इस संदर्भ में निर्णायक भूमिका 73वें तथा 74वें संविधान संशोधनों की रही। इनमें शहरी एवं स्थानीय स्वशासी निकायों में महिलाओं के लिए 1/3 सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है। इससे प्रेरित होकर महिला समूहों ने यह माँग करनी शुरू कर दी कि संसद के दोनों सदनों में भी उन्हें आरक्षण दिया जाये। 1996 से ही विभिन्न राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणापत्रों में यह वादा करते आ रहे हैं कि महिलाओं को उच्चतर विधायी निकायों में 33% आरक्षण दिया जायेगा, परन्तु यह अभी दूर की कौड़ी ही बना हुआ है। इसके दो कारण हैं – 1 राजनीतिक दलों के पुरुष सदस्यों को यह डर है कि कहीं सत्ता पर उनकी पकड़ ढीली न पड़ जाये तथा 2. राजनीतिक दलों का निहित स्वार्थ।

भारत में पर्यावरण से सम्बन्धित आन्दोलन भी शान्ति आन्दोलनों के घटक के रूप में उभरे हैं। वास्तव में पर्यावरणीय टकरावों की जड़ें भारत में विकास के नमूनों में निहित हैं। आजादी के बाद भारत में विकास के दो स्वदेशी नमूने थे – गांधीवादी नमूना तथा नेहरूवादी नमूना, परन्तु राजनीतिक नेतृत्व ने नेहरूवादी नमूने को अपनाया। गाँधीवादी नमूना अधिक पर्यावरण हितेषी था। इसमें निम्न पर जोर दिया गया था – लघु उद्योग, ग्राम और कुटीर उद्योग, वस्तुओं का स्थानीय उत्पादन, औद्योगिकीकृत अर्थव्यवस्था, राज्यतंत्र, संसाधनों का वाणिज्य दोहन तथा भारी औद्योगिकीकरण के विचार को खारिज करना, परन्तु विकास का नेहरूवादी नमूना अर्थव्यवस्था के केन्द्र – नियोजित आर्थिक विकास में निहित था। इस नमूने का जोर भारी औद्योगिकीकरण पर, पूँजी प्रधान प्रौद्योगिकी अपनाने पर तथा विकास की महापरियोजनाएँ स्थापित करने पर था। 1970 का दशक आते – आते देश के विभिन्न भागों में नेहरूवादी नमूने को अपनाया जाने लगा, परन्तु जनसाधारण को यह विश्वास हो गया कि प्राकृतिक संसाधनों के अतिशय वाणिज्यिक दोहन का विरोध होना चाहिए। योग्य नेतृत्व के कारण पर्यावरण आन्दोलन सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ संघर्ष चलाने के लिए आधार सिद्ध हुए। भारत में 1970 के दशक से तीन प्रकार के पर्यावरणीय आन्दोलन देखने में आए। भारत में पर्यावरण आन्दोलन की शुरुआत को लोगों के आन्दोलन के रूप में देखा गया।

प्र. 6 (क) उन्नत पंजीकृत राज्य पर बहस
(ख) राज्य और नागरिक समाज के बीच संबंध

उत्तर –
ग्राम्सकी के अनुसार एक उन्नत राज्य आंतक और दमन से नहीं, बल्कि वैचारिक संगठनों को सुधारकर शासन करता है। राज्य के दो तत्व है –
1. पुलिस, सेना तथा न्यायपालिका से युक्त संगठन तथा
2. नागरिक समाज की विभिन्न संस्थाएँ, जैसे – मीडिया, चर्च, क्लब, स्कूल, पार्टियाँ तथा श्रमिक संगठन।

शासक वर्ग प्रधानता के बल पर सत्ता पर अपनी पकड़ बनाये रखता है। ग्राम्सकी मानता है कि एक उन्नत पूँजीवादी व्यवस्था में समाजगत बलों की शक्ति के कारण पूँजीवादी वर्ग के लिए अपनी प्रधानता बताना संभव हो जाता है। लोकतन्त्रिक बहुलवादी दृष्टिकोण में उन्नत समाज का बचाव किया गया है। उन्नत पूँजीवादी के अन्तर्गत सभी लोगों के लिए उन्नति के अवसर समान होते हैं, जिसके कारण सत्ता सम्पन्न कुलीन वर्ग महत्वपूर्ण नहीं रह जाता है। जबसे राजनीतिक नागरिकता की मूल समस्याओं का समाधान हुआ है तब से रूढ़िवादियों ने कल्याणकारी राज्य को स्वीकार कर लिया है। उन्नत पूँजीवाद के अन्तर्गत वर्गविहीनता के सिद्धांत की कुछ सीमाएँ हैं। हांलाकि यह माना जाता है कि कल्याणकारी राज्य ने निर्धनों की स्थिति को सुधारकर असमानताओं को काफी हद तक कम कर दिया है।

मिलीबैंड ने अपनी रचनाओं में कल्याणकारी राज्य कि विस्तृत विश्लेषण किया है। मिलीबैंड ने ‘दी स्टेट इन कैपिटलिस्ट सोसायटी’ (1969)में बहुलवादी दृष्टिकोण की आलोचना की है। प्रारंभ में मिलीबैंड ने शासक वर्ग की अवधारणाओं की समीक्षा की है। मिलीबैंड के अनुसार औद्योगिक देशों में आर्थिक जीवन में राज्य का हस्तक्षेप होता है। इन देशों के सामाजिक ढाँचे में समानताएँ हैं। इन देशों में लोगों की आय का स्त्रोत स्वामित्व है। यही वर्ग शासक वर्ग है, परन्तु इन विकसित समाजों में भी एक तबका ऐसा, जो तंगहाली में अपना जीवन गुजारता है। पूँजीवाद एक निष्पक्ष संस्था नहीं है, बल्कि यह वर्ग हितों को बनाकर रखती है। कुलीनों की भर्ती पुश्तैनी होती है। कुलीन संस्थाओं में उच्च तथा मध्यम वर्ग की पहुँच होती है। कामगार वर्ग के विधार्थी अच्छी नौकरी प्राप्त नहीं कर पाते हैं। शक्तिशाली वर्गो के बीच मतभेद सीमित होते हैं। राज्य की व्यवस्था को धनी लोग नियंत्रित करते हैं। सरकार का प्रमुख उद्देश्य पूँजीवाद के हितों को बढ़ाना है। उच्च सिविल सेवा को भी तटस्थ नहीं माना जा सकता है। जजों की नियुक्ति सरकार करती है तथा ये ज़ रूढ़िवादी जजों की नियुक्ति करते हैं। मिलीबैंड के अनुसार उन्नत पूँजीवाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू है कि उसमें आर्थिक शक्ति का निरन्तर अस्तित्व रहता है, जिनके हाथों में सत्ता होती है। वे राज्य की नीतियों और कार्यों के निर्धारण में भारी प्रभाव रखते हैं। बुर्जुआ समाजों में असमान आर्थिक शक्ति असमान राजनीतिक शक्ति को जन्म देती है। मिलीबैंड के अनुसार पूँजीवाद लोग राज्य का प्रयोग समाज में वर्चस्व प्राप्त करने के लिए साधन के रूप में करते हैं। आलथूसर वैचारिक और संरचनात्मक तंत्र पर बल देता है। पूलनजास (1978) ने आलथूसर के सिद्धांतों को पूँजीवादी समाज के पुनरोत्पादन से जोड़ा है। राज्य शासक वर्ग के राजनीतिक हितों को बनाये रखने के साथ – साथ समाज में संतुलन स्थापित करने का कार्य भी करता है। मिलीबैंड ने राज्य को एक स्वायत्त तथा स्थिर करने वाला कारक माना है। संरचनानादी मत भी पूँजीवादी राज्य की निरन्तरता के अनिवार्य कारणों पर विचार नहीं करता है। मारक्यूस ने उन्नत पूँजीवाद में अतार्किकताओं को स्वीकार किया है, परन्तु मारक्यूस का कहना है कि इन अतार्किकताओं में से कुछ मे ही तार्किकता है, जिसे लोग महत्व देते हैं। इनमें से एक तार्किकता है मिथ्या चेतना की उपस्थिति, परन्तु पूँजीवादी व्यवस्था में भी ऐसे लोग होते हैं, जो असहमति की मशाल जलाये रखते हैं।

उत्तर (ख) राज्य और नागरिक समाज के बीच संबंध।

नागरिक समाज और राज्य के संबंध को अक्सर इस रूप में चित्रित किया जाता है कि वह टकराव पैदा करने वाला और ऐसा है जिसमें एक के लाभ से दूसरों को नुकसान होता ही होता है। मगर अधिकांश मामलों में राज्य और नागरिक समाज अपने अस्तित्व के लिए एक – दूसरे पर निर्भर होते हैं। नागरिक समाज को अपने अस्तित्व के लिए नियंत्रण की आवश्यकता होती है और सरकारें, कम से कम लोकतांत्रिक सरकारें अपनी शक्ति नागरिक समाज से प्राप्त करती है। राज्य के साथ नागरिक समाज का संबंध कई रूपों में हो सकता है, राज्य द्वारा नागरिक समाज का सहयोजन और अपने स्वार्थ के अनुसार प्रयोग, नागरिक समाज के कतिपय भागीदारों का राज्य पर प्रभाव और गहरी दखल, राजनीतिक और आर्थिक ढाँचे पर कुल सहमति के संदर्भ में दिनों के बीच उत्पादक तनाव, कुछ बुनियादी मुद्दों पर विवाद, नागरिक समाज संगठनों का राज्य से अलगाव और पृथकता या नागरिक समाज के प्रमुख हिस्सों द्वारा राज्य को सिरे से ख़ारिज कर दिया जाना। परस्पर जुड़े होने पर भी, नागरिक समाज समूहों को अगर नियंत्रण – शासन पर प्रभाव रखना है तो उन्हें राज्य से भिन्न होना ही चाहिए ओर राज्य को अपने तमाम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए स्वायत्त होना ही चाहिए।

निजी और राज्य के बीच निरंतरता में एक अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र राजनीतिक समाज है। राजनीतिक समाज की अवधारणा, कम से कम लोकतांत्रिक राज्यों में, राज्य की शक्ति की प्राप्ति और उसके प्रयोग के लिए औपचारिक प्रतियोगिता के क्षेत्र को इंगित करती है। इस क्षेत्र के प्रमुख भागीदार, राजनीतिक दल, विधानमंडलों के गठन और चुनावों के माध्यम से राज्य की शक्ति के प्रबंधन और औपचारिक प्रतियोगिता में विजेता गठबंधन बनाने और जन समर्थन जुटाने का प्रयास करते हैं। नागरिक समाज और राजनीतिक समाज में स्पष्ट अंतर है। खेल के नियमों को प्रभावित करने और नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करते हुए, नागरिक समाज संगठन, राज्य के पद के लिए औपचारिक रूप में प्रतियोगिता करने ओर हितों को एकत्र करने के लिए, दलगत आधार पर संगठित नहीं होते।
आर्थिक समाज – विशेषकर बाजार – के संदर्भ के बगैर नागरिक समाज की संकल्पना करने का अर्थ है नागरिक समाज और उसके संचालन की महत्वपूर्ण अंदरूनी जानकारी से चूकना। जैसा कि हम देख चुके हैं, यूरोप में नागरिक समाज कि अठारहवीं शताब्दी की अवधारणाओं का आधार सामाजिक व्यवस्था के लिए एक समस्या के रूप में श्रम – विभाजन और बढ़ती विशेषज्ञता के कारण होने वाली प्रतियोगिता और एक स्पष्टत: भिन्न सार्वजनिक क्षेत्र के रूप में बाजार की मान्यता थी। बाद में, मार्क्स ने नागरिक समाज को पूँजीवाद के विकास में एक विशेष राज्य के साथ जोड़ दिया। आज, नव वामपंथी बुद्धिजीवी नागरिक समाज को वैश्विक पूँजीवाद के खतरे और बाजार और राज्य के अतिक्रमण के खिलाफ बचाव के रूप में प्रस्तुत करते हैं। सामाजिक – आर्थिक समानता को मानते हुए या नागरिक समाज को एक लाभकारी क्षेत्र के रूप में परिभाषित करते हुए, टोकवीलवादी और नव उदारवादी सिद्धांतों में नागरिक समाज को आर्थिक क्षेत्र से अलग कर दिया गया है जैसे ” नागरिक समाज के भौतिक आधार और नागरिक समाज पर बाजार के नकारात्मक प्रभावों को अदृश्य कर दिया गया है। “बाजारों की ढाँचागत असमानता का प्रभाव राजनीतिक और सिविल समाजों पर पड़ता है।

प्र. 7 (क) रचनात्मक कार्यक्रम की गाँधीवादी अवधारणा
(ख) नागरिक समाज की प्रकृति और सीमा

उत्तर – (क) रचनात्मक कार्यक्रम की गाँधीवादी अवधारणा
सामाजिक प्रगति तथा परिवर्तन के लिए गाँधीजी के सूत्र रचनात्मक कार्यक्रमों में निहित है। इसकी संकल्पना सकारात्मक कार्यक्रम के रूप में की गई है। रचनात्मक कार्यक्रमों से ही सत्याग्रह को आधार मिला है। रचनात्मक कार्यक्रमों को स्वराज की प्राप्ति के लिए एक महत्वपूर्ण साधन माना गया है। इसके विषय थे – साम्प्रदायिक समरसता, अस्पृश्यता को समाप्त करना, नशा को बन्द करना, खादी का प्रयोग करना, कुटीर उद्योगों की स्थापना, ग्रामीण स्वच्छता, बुनियादी शिक्षा प्रदान करना, प्रौढ शिक्षा, महिलाओं की स्थिति में सुधार, स्वास्थ्य शिक्षा तथा राष्ट्रभाषा का प्रचार – प्रसार। गाँधीजी मानते थे कि कताई – बुनाई उद्योग में भारत की आर्थिक, राजनीतिक तथा मनोवैज्ञानिक समस्याओं का समाधान निहित है। गाँधीजी ने खादी कार्यक्रम के समुदाय को संगठित करने की क्षमता पर विशेष जोर दिया है। गाँधीजी मानते थे कि लोगों की स्वतंत्रता, स्वामित्व तथा सम्मान के बोध को संरक्षित करने के लिए उद्योगों का विकेन्द्रीकरण आवश्यक है। गाँधीजी ऐसी मानसिकता विकसित करना चाहते थे, जिससे राज्य और सरकार पर निर्भरता कम हो सके। गाँधीजी यह मानते थे कताई से शरीर और आत्मा की शुद्धि होगी तथा व्यक्ति आध्यात्मिक प्रगति की ओर बढ़ेगा।

रचनात्मक कार्यक्रम का एक प्रमुख पहलू बुनियादी शिक्षा पर जोर देना है। बुनियादी शिक्षा से गाँधीजी का अभिप्राय था कि व्यक्ति को लिखना – पढ़ना आ जाये। इसका उद्देश्य व्यक्ति को आत्म – निर्भर बनाना था। गाँधीजी यह मानते थे कि नागरिक समाज की प्रगति जीवन भर चलनी चाहिए। इसे बचपन में ही समाप्त नहीं हो जाना चाहिए। गाँधीजी यह मानते हैं कि व्यक्ति में जीवन भर ज्ञान को आत्मसात करने की क्षमता होती है। गाँधीजी के अनुसार शिक्षा व्यक्ति को मातृभाषा में ही देनी चाहिए और गाँधीजी के लिए यह भाषा हिन्दी है। गाँधीजी 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा देने के समर्थक थे।

गाँधीजी ने ग्रामीण भारत में व्याप्त गंदगी की ओर भी ध्यान दिया है। उन्होंने इस समस्या के समाधान के लिए स्वास्थ्य शिक्षा एवं साफ – सफाई की शिक्षा देने पर जोर दिया है। गाँधीजी ने भारतीय समाज के शोषित एवं उपेक्षित तबकों की ओर भी ध्यान दिया है। गाँधीजी ने बाल विवाह तथा पर्दा प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों का विरोध किया। गाँधीजी के नेतृत्व में अनेक महिलाओं ने स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लिया था। 1930 के दशक में गाँधीजी ने महिलाओं को यह छूट दी कि वे शराब की दुकानों के बाहर धरना दे सकती है तथा सत्याग्रह में शामिल हो सकती है। गाँधीजी द्वारा किये गये मानवीय कार्यों में महिलाओं ने भी उनकी सहायता की थी। गाँधीजी मानव जाति की समानता पर विश्वास करते थे। वे सभी प्रकार के भेदभावों के खिलाफ थे। समाज का आधार उन्होंने समानता और न्याय को माना है।

गाँधीजी ने रचनात्मक कार्यक्रमों में स्वतंत्रता को समरसता से जोड़ने का प्रयास किया। शहरी कुलीनों तथा ग्रामीण लोगों के बीच की खाई को पाटने के लिए खादी और चरखे की महत्वपूर्ण भूमिका थी। गाँधीजी ने अस्पृश्यता और साम्प्रदायिकता, दोनों को खतरनाक माना है। गाँधीजी के अनुसार अस्पृश्यता से तब तक लड़ने की आवश्यकता है जब तक यह समाप्त नहीं हो जाती है। गाँधीजी स्वतंत्रता एवं समरसता को एक करना चाहते थे। वे जाति एवं धर्म के संघर्षों को समाप्त करना चाहते थे। गाँधीजी ने समझौता एवं सहयोग पर तो जोर दिया ही, साथ – ही – साथ विविध हितों को मिलाने की भी कोशिश की।

उत्तर (ख) नागरिक समाज की प्रकृति और सीमा

कुछ राजनीतिक चिंतकों की कृतियों में राज्य और नागरिक समाज के बीच भेद किया गया है। हाॅब्स, लाॅक तथा हीगल के अनुसार नागरिक समाज पर ही राज्य आधारित होता है, क्योंकि राज्य भी समाज का ही एक हिस्सा होता है। नागरिक समाज के अन्तर्गत आर्थिक सम्बन्ध, पारिवारिक ढाँचों, धार्मिक – सांस्कृतिक तथा शैक्षिक संस्थाएँ आती है।

17वीं शताब्दी के मध्य तक नागरिक समाज को राज्य का पर्याय समझा जाता था। अरस्तु का Politike koinonis नागरिकों के नैतिक – राजनीतिक लोकतंत्र को महत्व देता है। सन् 1750 से 1850 के मध्य की कृतियों में ही नागरिक समाज की अवधारणा ने एक महत्वपूर्ण स्वरूप प्राप्त किया। नागरिक समाज असाधारण की उत्पत्ति उदारवाद के साथ ही हुई है। हाॅब्स राज्य और नागरिक समाज को एक ही मानता  है। लाॅक ने राजनीतिक लोकतंत्र को एक विस्तृत परिवार से अलग बताया है। लाॅक के अनुसार राजनीतिक शासन पैतृक नहीं होता है। हाॅब्स तथा लाॅक दोनों ही सामाजिक अनुबंध स्थापित करने के लिए नागरिक समाज की विशिष्टताओं को वापस प्रकृति की स्थिति में ले आते हैं।

औद्योगिक तथा फ्रांसीसी क्रांतियो के बाद नागरिक समाज अन्त :क्रिया तथा विनिमय के सम्पर्क जाल के रूप में उभरता है। माॅन्टेस्क्यू के अनुसार वाणिज्यवाद के लाभ युद्ध एवं सैनिक अभियानों के खतरों में सहायक होते हैं। माॅन्टेस्क्यू के मत को दोहराते हुए ह्यूम, स्मिथ, फगर्युसन तथा मिलर भी कहते हैं की “नागरिक समाज का गठन केवल विनिमय की भौतिक इच्छा से ही नहीं होता, बल्कि अनुबंध से होता है, जिसके लिए विश्वास और न्याय अत्यंत आवश्यक है।” स्कॉटिश प्रबोधन के चिन्तकों ने नागरिक समाज का एक नया वर्णन प्रस्तुत किया है। इन चिन्तकों ने नागरिक समाज की पारंपरिक अवधारणा को नष्ट किया है। अब आर्थिक व्यवस्था सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह अब बाजार और श्रम विभाजन के विस्तार से अत्यधिक लाभ प्राप्त कर रही है। फगर्युसन ने अपनी रचना ऐन एस्से आॅन दी हिस्ट्री आॅफ सिविल सोसायटी ‘(1767) में नागरिक समाज का विस्तृत विश्लेषण किया है। फगर्युसन ने राज्य और नागरिक समाज को एक समान माना है। नागरिक समाज कानून और सैनिक शक्ति के द्वारा कलाओं, सांस्कृतिक उपलब्धियों तथा जनभावना के बोध को बचाता है। पेने ने राज्य की शक्ति को सीमित करने के लिए नागरिक समाज को आवश्यक माना है। पेने नागरिक समाज को एक अच्छाई तथा राज्य को एक आवश्यक बुराई मानता है। नागरिक समाज का आधार साझा हित, जो कानूनों द्वारा मजबूत बनते हैं। टोकवील्ले यह मानता है कि स्वेचछाचारी सत्ता की समस्या से निपटने के लिए नागरिक समाज एक महत्वपूर्ण साधन है। नागरिक समाज के अन्तर्गत ही नागरिक अपने अधिकारों तथा अपने कर्तव्यों को सीखते हैं। नागरिक समाज में ही नागरिक दूसरों के दायित्वों से परिचित होते हैं। टोकवील्ले ने नागरिक समाज के अन्तर्गत साहचर्य के अधिकार को अभिन्न माना है, एक बहुलवादी नागरिक समाज लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण होता है। टोकवील्ले ने इस सन्दर्भ में एक तीन भाग वाला नमूना प्रस्तुत किया है, जिसमें नागरिक समाज, राजनीतिक समाज तथा राज्य के प्रशासनिक तंत्र के मध्य अन्तर स्पष्ट किया गया है।

हीगल ने अपनी रचनाओं में नागरिक समाज का विस्तृत विश्लेषण किया है। हीगल ने राज्य और नागरिक समाज को दो अलग चीजें माना है। हीगल के अनुसार नागरिक समाज में निजी व्यक्तियों की सम्पूर्णता मूर्त होती है। नागरिक समाज को बुर्जुआ समाज माना जाने लगा, जो निजी स्वतंत्र एवं समान व्यक्तियों का समाज होता है। हीगल के अनुसार नागरिक समाज व्यक्तियों का समाज होता है। हीगल के अनुसार नागरिक समाज हितों के टकराव का प्रतिनिधित्व करता है। हीगलवादी विचारधारा के समर्थक विद्वान तथा मार्क्स नागरिक समाज तथा राज्य के परस्पर सम्बन्ध की आलोचना करते हैं। मार्क्स के अनुसार नागरिक समाज घोर – भौतिकवाद की, सम्पतिगत सम्बन्धों की, संघर्ष की तथा अहंवाद की स्थली है। मार्क्स कहता है कि नागरिक समाज का उदय मध्ययुगीन समाज के विनाश से हुआ है। मार्क्स मानता है कि मध्ययुग में नागरिक समाज जैसी किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि व्यक्ति इस युग में अनेक समाजों (श्रेणी, रियासत, राज्य) का हिस्सा था। इन आंशिक समाजों के नष्ट हो जाने पर ही नागरिक समाज का उदय हुआ। पुराने बंधनों के स्थान पर व्यक्तियों की स्वार्थपूर्ण आवश्यकताएँ आ गई है। नागरिक समाज की खण्डित प्रगति ही आधुनिक राज्य का स्वरूप निश्चित करती है।

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