MHD 06 Solved Assignment 2020-21

MHD 06 Solved Assignment 2020-21

MHD 06 Solved Assignment हिन्दी भाषा और साहित्य का इतिहास

MHD 06 : हिन्दी भाषा और साहित्य का इतिहास

Solved Assignment

July 2020 and January 2021 

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Title – MHD 06 हिन्दी भाषा और साहित्य का इतिहास

University – Ignou

Assignment Types – PDF, SOFT COPY /Handwritten on order

Course – Master of Arts Hindi (MHD)

Medium / Language – HINDI

Session – JULY 2020, JANUARY 2021

Subjects code – MHD 06

Assignment Submission Date – July 2020 session के लिए – 31 March 2021, January 2021 session के लिए – 30 September 2021.

(MHD) Master of Arts Hindi

MHD 6 Solved Assignment 2020-21

प्रश्न 3. प्रगतिशील कविता की प्रमुख प्रवृतियों का विवेचना कीजिए।
उत्तर – प्रगतिशील कविता की निम्नलिखित प्रवृत्तियां है-

राष्ट्रीयता की भावना की अभिव्यक्ति – प्रगतिवादी युग अपने युग की समस्याओं के प्रति सचेत दिखाई देता है। उसने देश और विश्व की ज्वलंत समस्याओं के प्रति दृष्टिपात किया। उसने हिरोशिमा के नाश के लिए अमेरिका को कोसा‌। साथ ही बंगाल में अकाल, देश के विभाजन, महंगाई, बेकारी आदि समस्याओं पर अपने विचार व्यक्त किए।

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वामपंथी विचारधारा और राजनीति का प्रभाव – साम्यवादी विचारधारा प्रगतिवादी कविता का मूल है। रूस में साम्यवाद ने पूर्ण सफलता प्राप्त की । अत : प्रगतिवादी कवियों की आशा का केंद्र रुस बन गया । उन्होंने लाल सेना, लाल चीन, लाल झंडा आदि पर अनेक काव्यमय विचार व्यक्त किए। रूस की लाल सेन पर ‘सुमन’ की कविता की कतिपय पंक्तियां प्रस्तुत है –

MHD 6 Solved Assignment 2021 

‘युगों की सड़ी रुढ़ियों को कुचलती,
लहर की लहर से सदा ही मचलती।
अंधेरी निशा में मशालों – सी जलती,
चली आ रही है बढ़ती लाल सेना।।’

उत्पीड़ित जनता से जुड़ाव- प्रगतिवादी कविता की यह भी एक विशेषता है कि उसमें शोषित और निधन वर्ग के प्रति सहानुभूति की भावना के दर्शन होते हैं । प्रगतिवादी कवियों ने मजदूरों और किसानों का अपनी कविता में सजीव और हृदयग्राही चित्रण किया है । निराला जी की ‘वह तोड़ती पत्थर’ कविता में पत्थर तोड़ने वाली नारी की विवशता, भय और कार्यशीलता के मार्मिक वर्णन के साथ पूंजीपतियों की विलासिता और क्रुरता का चित्रण किया है । कवि सुधीन्द्र ने शोषित वर्ग की दयनीयता का चित्रण इस प्रकार किया है कि
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‘एक ओर समृद्धि थिरकती, पास से सिसकती है कंगाली,
एक देह पर एक न  चिथड़ा, एक स्वर्ण के गहने वाली।’

ग्राम्य – जीवन के प्रति लगाव – प्रगतिवादी कभी श्रम का उपासक है । वह संसार में प्रत्येक वस्तु को श्रम के द्वारा ही प्राप्त करना चाहता है। इसलिए उसने मजदूर और किसानों के प्रशंसा की है । किसान और श्रमिक दोनों का जीवन परिश्रम की करुणा कहानी है । प्रगतिवादी कवि ने ग्राम्य – जीवन की दीनता का चित्रण करते हुए कहा है कि –

‘यह भारत का ग्राम, सत्यता, संस्कृति से निर्वासित ।
झाड़ फूंक के विवर यही, क्या जीवन शिल्पी के घर।।’

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शोषक सत्ता का विरोध- प्रतिवादी कवियों ने जहां अपने शब्दों में शोषित वर्ग के प्रति सहृदयता प्रकट की है, वही दूसरी ओर शोषक वर्ग के प्रति घृणा की  है। शोषक वर्ग में जमीदार, उद्योगपति बा मिल मालिक आते हैं। यह वर्ग मजदूरों और किसानों की खून पसीने की कमाई से विलासिता और वैभव का जीवन व्यतीत करता है। बेचारे मजदूरों के बच्चों को दूध की बूंद तक नहीं मिलती और पूंजीपतियों के कुत्ते दूध का पान करते हैं। पूंजीपति  वर्ग की प्रकृति की भर्त्सना करते हुए कविवर ‘दिनकर’ ने कहा है-

श्वानों को मिलता दूध, वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते है।
मां की हड्डी चिपट, ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं।
युवती की लज्जा वसन बेच, जब ब्याज चुकाने जाते हैं।
मालिक जब तेल फुलेलों पर, पानी – सा द्रव्य बहाते हैं।’

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सामाजिक परिवर्तन पर बल – साम्यवाद में क्रांति को विशेष महत्व प्रदान किया गया है। अतः प्रगतिवादी कवि समाज, राजनीतिक और आर्थिक जीवन में शनै – शनै परिवर्तन के पक्ष में नहीं है। वह क्रांति की हिंसावृति में विश्वास करता है।

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