MPSE 001 Solved Assignment 2020

MPSE 001 Solved Assignment 2020

MPSE 001 Solved Assignment 2020

MPSE – 001 भारत और विश्व
INDIA AND THE WORLD
Solved Assignment
July 2019 and January 2020

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Title – MPSE – 001 भारत और विश्व
INDIA AND THE WORLD

University – Ignou

Assignment Types – PDF, SOFT COPY /Handwritten on order

Course – Master in Political Science (mps) 

Medium / Language – HINDI MEDIUM / ENGLISH MEDIUM BOTH AVAILABLE

Session – JULY 2019, JANUARY 2020

Subjects code – MPSE001

Assignment Submission Date – July 2019 session के लिए – 30 April 2020, January 2020 session के लिए – 30 September 2020.

MPSE 001 Solved Assignment 2019 – 2020 Hindi Medium

 

Q.1 भारतीय विदेश नीति के अध्ययन के लिए यथार्थवादी और अन्त : निर्भरता दृष्टिकोण का संक्षिप्त परीक्षण कीजिए।

Ans.

भूमिका :- भारतीय विदेश नीति से संबंधित साहित्य ने इस के बारे में कई उपागम प्रस्तुत किए हैं। परंपरागत उपागम का क्षेत्र कई सिद्धांतों पर आधारित है जैसे यथार्थवाद, नव – यथार्थवाद, अंतर – निर्भरता (परस्पर निर्भरता) एवं जटिल अंतर – निर्भरता। यह उन उपागमों पर भी आधारित है जिनकी जड़े आंतरिक सांस्कृतिक एवं सांस्कृतिक एवं सामाजिक – राजनीतिक प्रकृति हैं, तथा जिनका केंद्र ऐतिहासिक अनुभवों और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन तथा महात्मा गांधी एवं जवाहरलाल नेहरू जैसे भारतीय नेताओं के आदर्श और आकांक्षाएँ थीं।

प्रारंभ में ही, हमें दो विषयों पर बल देने की आवश्यकता है। प्रथम, प्रत्येक उपागम हमें भारतीय विदेश नीति को समझने में सहायता प्रदान करता है, परंतु विभिन्न उदार संदर्भ में अध्ययन करने की जरूरत है। कोई भी एक उपागम भारतीय विदेश नीति के निर्माण और संचालन की जटिलता को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके अतिरिक्त इस उपलब्ध साहित्य की एक विशेषता है, जो इस देश की मूल है। इस कारण नीति निर्माता एवं कार्यवाहक अपनी इस प्रक्रिया को किसी अनम्य सैद्धांतिक ढाँचे के अनुरूप नहीं ढाल पाए।

भारतीय विदेश नीति अंतर्राष्ट्रीय सम्बंधों की प्रतिक्रियाओं का मिश्रण मात्र नहीं है। चाहे कोई भी कारण हो – क्षेत्र का विस्तार, जनसंख्या, अर्थव्यवस्था, नेतृत्व इत्यादि – भारत ने निरंतर स्वतंत्र एवं उत्साहपूर्वक अंतर्राष्ट्रीय प्रक्रिया में अपनी क्षमता और स्थिति के अनुसार और अपने उत्तरदायित्वों से अभिज्ञ अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की प्रक्रियाओं को प्रभावित किया है।

MPSE 001 Solved Assignment 2019 – 2020

भारतीय विदेश नीति के यथार्थवादी दृष्टिकोण

यह तर्क स्वयंसिद्ध है कि शायद अमेरिका को छोड़कर भारत की विदेश नीति के संस्थापक अथवा भारतीय युद्ध नीतियों पर यथार्थवाद का अभिभावी प्रभाव रहा था। कम से कम छह अभिज्ञेय समूहों के सोपानक अर्थात सैनिक, राजनयिक दूतवर्ग, नौकरशाही (जिसमें विदेश सेवा भी सम्मिलित हैं), राजनीतिक वर्ग, मीडिया एवं परिषद सदस्य से नीति विशेषज्ञ तथा विदेश नीति संगठन से वैज्ञानिकों एवं तकनीकों एवं तकनीकीकर्ताओं के समुदाय भारत की विदेश नीति के निर्माण में सहायक हैं।

राजनीतिक यथार्थवाद शक्ति को अंतरराज्यीय संबंधों का आधार मानता है जोकि सामान्यतः संघर्षात्मक तरीका माना गया है, जहाँ प्रत्येक राज्य स्वार्थपरक तरीके से अपने हित की प्राप्ति में लगा रहता है। नव – यथार्थवाद राजनीति की सर्वोच्चता को स्वीकार करता है, लेकिन यह भी मानता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों का आधार अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था है, जोकि सिर्फ संघर्ष ही नहीं बल्कि पात्र या राज्यों के हितों के अभिसरण पर आधारित है।

उक्त उल्लिखित दृष्टिकोण के अनुसार, बाहय राष्ट्रीय सुरक्षा तथा आंतरिक राष्ट्रीय एकता के साथ तीन प्रमुख लक्ष्य जुड़े हुए पाए गए हैं। दो अतिरिक्त लक्ष्य है, – तृतीय विश्व में तथा क्षेत्र के अंतर्गत नेतृत्व, एवं भारत के क्षेत्र, महता और सामर्थ्य के अनुरूप राष्ट्र – राज्य के समूहों के बीच एक उचित स्थान।

जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कुशल कूटनीतिक विदेश नीति की एक प्रमाण या छापी मानी गई, इंदिरा गांधी के नेतृत्व में सैन्य शक्ति का क्रमबद्ध विकास, तथा 1990 के पश्चात् चतुराईपूर्व महत्वपूर्ण शक्तियों को राजनीतिक एवं युद्धनीति संबंधित वार्ताओं में व्यस्त रखना भारतीय विदेश नीति की महत्वपूर्ण क्षमता को प्रदर्शित करता है, जो उसके बड़ी शक्ति होने का प्रमाण है।

इस प्रवृत्ति के कारण ही सभी राजनीतिक उदघोषणाओं और विश्लेषणों में अक्सर भारत को एक बड़ी शक्ति या बड़ी शक्ति की क्षमता वाला देश माना गया है। परमाणु बम के परीक्षण एवं 1993 के बाद से प्रक्षेपास्त्र प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियों के कारण भारत को एक ‘बड़ी’ शक्ति, कभी ‘उभरती’ हुई शक्ति एवं कभी ‘महाशक्ति’ कह कर संबोधित किया जाने लगा है।

स्वतंत्रता पश्चात करीब 1960 के दशक तक भारत के ‘युद्धनीतिज्ञ समूह’ ने देश को भविष्य में एक महान शक्ति बनना एक नियति माना तथा दो अन्य एशियाई शक्तियों – रूस एवं चीन – को इसका प्रतिद्वंद्वी माना। 1980 के दशक तक भारतीय यथार्थवादियों का महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण था, लेकिन उन्होंने भारत की क्षेत्रीय महता को इस प्रकार प्रस्तुत किया कि समस्त विश्व इस तथ्य को स्वीकार कर ले।

भारतीय विदेश नीति के यथार्थवादी दृष्टिकोण में कुछ ऐसे प्रसंग हैं, जिनकी बार – बार पुनरावृत्ति हुई। सर्वप्रथम सर्वथा यह देखा गया कि चीन भारत का संभावित या वास्तविक सैन्य प्रतियोगी या प्रतिद्वंद्वी हैं। 1962 के भारत – चीन संघर्ष तथा सीमा विवाद ने इस दृष्टिकोण को बल प्रदान किया है कि दो बड़े और शक्तिशाली पड़ोसियों का प्रतिद्वंद्वी होना तय है – कम से कम समय – समय पर तो अवश्य ही। पाकिस्तान का विद्वेष तथा जम्मू कश्मीर के ऊपर विवाद, शीत युद्ध के समय सोवियत संघ की तरफ झुकाव एवं उसके साथ 1971 की मैत्री संधि तथा भारत – अमेरिका संबंधों के हर एक पहलू का चीनी आयाम रहा। चीन का एक आर्थिक एवं सैन्य शक्ति के रूप में उदय का एशिया एवं प्रशांत तथा हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा में बड़ा एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा।

परिणामतः क्षेत्रीय समीकरणों के असंतुलन एवं पुन : संतुलन (बनने – बिगड़ने) से भारत की सुरक्षा और संप्रभुता पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा। चीन के इस असंतुलित प्रभाव के जवाब में भारत की विशाल जनसंख्या बढ़ता हुआ सकल घरेलू उत्पाद तथा कुशल मानव – शक्ति एवं इसके दस लाख से भी अधिक बड़े सुरक्षा बल को हमेशा तैयार रहना होगा। 1998 के परमाणु परीक्षण से पहले का यह घोषित मत कि चीन भारत का शत्रु नंबर एक है इसी यथार्थवादी चिंतन को प्रदर्शित करता है।

कुछ यथार्थवादी यह भी मानते हैं कि ऐसा भी संभव है कि भविष्य में एक शक्तिशाली चीन और एक शक्तिशाली भारत मित्र – राष्ट्र भी बन सकते हैं। चीन की सैन्य चुनौती का प्रतिकार एवं भारत का ‘बड़ी शक्ति’ के संघ में होना उसके परमाणुकरण को तर्कसंगत ठहराता है। अतः यह तर्क दिया जाता है कि भारत का परमाणु शक्ति होने का निर्णय उसके पाकिस्तान के संबंधों से स्वतंत्र है।

एक अन्य चिंता का विषय है – ‘चीन – पाकिस्तान धुरी’। पाकिस्तान चीन का उदय उस समय से सबसे भरोसे का साथी है, जब चीन अंतर्राष्ट्रीय मसलों में अलग – थलग पड़ गया था। चीन का पाकिस्तान को गुप्त रूप से उसके परमाणु एवं प्रक्षेपास्त्र विकास कार्यक्रम में मदद देना, उनके भारत – विरोधी रिश्ते को दिखाता है। कुछ बाहरी शक्तियों और दबाव का उद्देश्य भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य समानता लाना है, जोकि भारतीय विदेश नीति निर्माताओं एवं नेतृत्व के लिए चिंता का विषय है।

भारत क्षेत्र, जनसंख्या, सकल घरेलू उत्पाद, सैनिक क्षमता आदि में पाकिस्तान से कई गुना बड़ा है। पाकिस्तान से सैन्य समानता की यह बाहरी विचारधारा, उसके बड़ी शक्ति होने के भारत के दावे पर रुकावट खड़ी करती है। अंतर्राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय शक्तियों का अभिमुख होना तथा जम्मू और कश्मीर विवाद ने भारत – पाकिस्तान संबंधों को कटु बना दिया है। यथार्थवादियों का कहना है कि पाकिस्तान के साथ विरोध राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक है। पाकिस्तान भारत की सीमा – पार से जम्मू – कश्मीर एवं पूर्वोत्तर राज्यों में आतंकवादियों को मदद करना जैसी कई घरेलू समस्याओं का स्त्रोत है।

अन्त : निर्भरता दृष्टिकोण

एक प्रचलित दृष्टिकोण के अनुसार भारत के घरेलू कारक तथा विदेश नीति प्राथमिकताओं के बीच गहरा संबंध है। राजनीतिक – सैनिक सुरक्षा से संबंधित संकीर्ण तथा सामान्य धारणा न सिर्फ गतिहीन है, बल्कि पुरानी भी है। 1990 के दशक में अधिकतर लेखों में यह कहा गया है कि भारत की विदेश नीति राजनीतिक अस्थिरता एवं विचारधारा की इस अनिश्चितता से गुजर रही है कि बाह्य संबंधों का मूलभूत लक्ष्य तथा उचित साधन कैसा होगा।

सैनिक – राजनीतिक सुरक्षा किसी भी देश की सुरक्षा का सिर्फ एक पहलू है, तथा यह परिभाषा सिर्फ संकीर्ण ही नहीं बल्कि गतिहीन भी है। पर्यावरण प्रदूषण, सीमा – पार विस्थापन, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का जाल, अपराध तथा गैर – कानूनी तरीके से पूँजी का हस्तांतरण तथा दक्षिण के देशों में बढ़ती गरीबी एवं सामाजिक सुरक्षा व संप्रभुता से संबंधित हैं। महाशक्तियाँ भी समस्त विश्व की उस चुनौती का सामना कर रही है, जो अत्यधिक अंतर – निर्भरता व बहु – ध्रुवीय है। नई चुनौतियों का सामना करने के लिए नए तरीके के अंतर – राज्य सहयोग तथा परा – राज्य गतिविधियों की आवश्यकता है।

👉 MPSE 004 Solved Assignment 2020 

शीतयुद्ध के पश्चात् तथा तेजी से हो रहे आर्थिक एकीकरण से अंतर्राष्ट्रीय संबंध अंतर – निर्भर हो गए हैं। पश्चिम के विकसित देशों तथा दक्षिण के विकासशील देशों के बीच बढ़ते हुए सामाजिक एवं आर्थिक तथा सभी विकासशील देशों के अंतर्गत विशिष्ट वर्ग एवं गरीबों की विशाल जनसंख्या के बीच बढ़ता हुआ अंतर और विश्व – व्यापी पर्यावरण प्रदूषण आदि समस्याओं पर यथार्थवादी विचार नहीं करते हैं।

अंतर – निर्भरता आर्थिक वैश्वीकरण के पहलुओं को रेखांकित करता है, अर्थात परा – राष्ट्रीय आर्थिक कर्ता, प्रक्रिया एवं संस्थाओं का उदय। ये परा – राष्ट्रीय निकाय है – विश्व व्यापार संगठन, विश्व मुद्रा कोष, विश्व बैंक तथा जी – 7 के देश। इन सभी निकायों पर अधिकतर बड़े और विकसित देशों का दबदबा बना रहता है इस लिए भारतीय विदेश नीति की एक मुख्य चुनौती है कि वह इन अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं में किस प्रकार हस्तक्षेप करे।

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भारत के यथार्थवादियों ने चीन को एक संभावित बड़ी शक्ति या भविष्य की महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। यह सलाह भी दी गई है कि भारत को चीन के साथ आर्थिक गठबंधन करके लाभ उठाना चाहिए तथा व्यावहारिक तरीके से आदान – प्रदान की प्रक्रिया से सीमा – विवाद को सुलझाना चाहिए। आज आज के समय में यह जरूरी नहीं है कि भौगोलिक निकटता एक प्राकृतिक तौर पर प्रतिद्वंद्विता के संबंध उत्पन्न करे। इसके विपरीत, यह परा – सीमा व्यापार, निवेश तथा संयुक्त उत्पादन व्यवस्था की शुरुआत हो सकती है। चीन तथा भारत के बीच का व्यापार भी – अर्थशास्त्र के सिद्धांत को सही ठहराता है।

आलोचकों को मानना है कि क्षेत्रीय अग्रता की यथार्थवादी धारणा ने अनेक समस्याओं को जन्म दिया है। इसके स्थान पर भारतीय विदेश नीति को दक्षिण एशिया में आर्थिक सहयोग पर ध्यान देना चाहिए। सामान्यत : दक्षिण एशिया केंद्रित विदेश नीति के दो पहलुओं पर बल दिया गया है। भारत को दक्षिण एशिया में आर्थिक सहयोग के लक्ष्य को प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।

अंत : निर्भरता एक भिन्न प्रकार की व्यावहारिकता की बात करती है, जोकि व्यापार एवं आर्थिक सहयोग पर केंद्रित है। परिवर्तन के लक्षण स्पष्ट हैं। उदाहरण के तौर पर, विदेश आर्थिक नीतियों में वित्त मंत्री का योगदान बढ़ गया है, जबकि विदेश मंत्रालय, विशेषकर विदेशों में भारतीय दूतावासों का योगदान सहूलियत प्रदान करने का रह गया है। घरेलू क्षेत्रों में विदेश नीति का प्रभाव तथा निगम क्षेत्र की भूमिका बढ़ गई है। सरकार भले ही नीतियों का निर्माण करती है, परंतु निगम ही उसे कार्यान्वित करते हैं। यह एक विवादास्पद विषय है कि क्या भारत के निगम क्षेत्र ‘युद्धनीति समुदाय’ के एक प्रभावशाली सदस्य बन सके।

 

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