MPSE 004 Solved Assignment 2020

MPSE 004 Solved Assignment 2020

MPSE 004 Solved Assignment 2020

MPSE-004 आधुनिक भारत में सामाजिक और राजनीतिक चिंतन
Social And Political Thought In Modern India
Solved Assignment
March – 2020 / December – 2020

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Title – MPSE-004 आधुनिक भारत में सामाजिक और राजनीतिक चिंतन
Social And Political Thought In Modern India

University – Ignou 

Assignment Types – PDF, SOFT COPY /Handwritten on order

Course – Master in Political Science (mps) 

Medium / Language – HINDI MEDIUM / ENGLISH MEDIUM BOTH AVAILABLE

Session – JULY 2019, JANUARY 2020

Subjects code – MPSE004

Assignment Submission Date – July 2019 session के लिए – 30 April 2020, January 2020 session के लिए – 30 September 2020.

 

Complete Solved Assignment pdf Hindi /English Medium Available – 8851761957 (What’s app only) 50rs /-

MPSE 004 Solved Assignment 2019 – 2020 Hindi Medium

 

प्र. 1 मध्यकालीन भारत में राज्य और संप्रभुता की प्रकृति पर चर्चा कीजिए।

उत्तर –

भूमिका :- भारतीय राजनीतिक चिंतन (विचारधारा) को समझने के लिए उन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की व्यापक जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है जिनके माध्यम से आधुनिक राज्यव्यवस्था का उदय हुआ जिसने है। भारतीय चिंतन को पूर्ण रूप से जानने के लिए प्राचीनकलीन भारत, मध्यकालीन भारत और आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन को समझना होगा। हमारे पास ऐसी सभ्यता है जिसकी तुलना यूनान की सभ्यता से की जा सकती है।

जिस प्रकार प्लेटो और अरस्तू को पश्चिमी राजनीतिक परम्परा का अग्रणी समझा जाता है, उसी प्रकार शासनकला पर हमारे प्राचीन और मध्यकालीन ग्रंथों को अग्रणी माना जाता है। चाहे यह राजतंत्र, गणतंत्रवाद, मंत्रिपरिषद, कल्याणकारी राज्य, कूटनीति, गुप्तचर व्यवस्था हो अथवा कोई अन्य राजनीतिक अवधारणा इन सभी का उल्लेख हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।

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राज्य, समाज और शासन एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्रारंभ में लोग छोटे छोटे संबंधी समूहों में रहते थे। उन्हें किसी सत्ता की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन जब जनसंख्या बढ़ी, आपसी संघर्ष बढ़ा तो शासक की आवश्यकता महसूस हुई जो लोगों को संरक्षण दे सके, जिसके आदेशों का सभी पालन करे। इस प्रकार लोगों के समूहों के साथ मे आ जाने से समाज अस्तित्व में आया फिर राज्य और शासन कला का उदय हुआ।

भारतीय राजनीतिक चिंतन की जानकारी हमें महत्वपूर्ण ग्रंथों के द्वारा मिलती है। मनुस्मृति, अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथ से हमें भारतीय राजनीतिक चिंतन, शासन कला की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है इस के अलावा फतवा – ए – जहांदारी, आइने अकबरी जैसे इतिहासिक पुस्तकों की सहायता से हमें मध्यकालीन भारतीय राजनीतिक चिंतन को समझने में आसानी होती है।

मध्यकालीन भारत में राज्य और संप्रभुता

भारत में इस्लाम के आगमन और मुस्लिम राजनीतिक सत्ता की स्थापना ने भारतीय राजनीतिक चिंतन में एक विशेष चरण के आरंभ की शुरुआत की। इस्लामी राजनीतिक चिंतन मोहम्मद की शिक्षा और कुरान के कानून की सर्वव्यापकता के इर्द – गिर्द केन्द्रित है। वेदांत दर्शन के विपरीत मुस्लिम कुरान को एकमात्र और अंतिम सत्ता मानते हैं। इस्लाम के आगमन से पहले भारत की राजनीतिक संरचना केवल एक ग्रंथ के दर्शन और विश्वास पर आधारित नहीं थी बल्कि विभिन्न धार्मिक परम्पराओं ने प्राचीन भारत में राजनीतिक परम्पराओं के विकास में योगदान किया। इस्लामी चिंतन, कुरान पर आधारित शरियत को अंतिम सत्ता समझा जाता है।

मध्यकालीन भारतीय राजनीतिक चिंतन के स्त्रोत :-

हिन्दुस्तान में मुस्लिम शासन के दौरान लिखी गई शासन के भेदों संबंधी दो प्रामाणिक पुस्तकों :-
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(1) फतवा – ए जहांदारी
(2) आइने अकबरी

MPSE 004 Solved Assignment 2020 hindi medium pdf

इन पुस्तकों में हम मध्यकालीन भारत के राजनीतिक चिंतन को समझ सकते हैं।

फतवा – ए – जहांदारी :- जियाउद्दीन बरनी द्वारा लिखी गई थी। इस पुस्तक में बरनी ने अपने पूर्व वृतांत तारीखे – फिदोज़शाही के आधार सल्तनत के राजनीतिक दर्शन पर विचार किया है और वर्णन किया है। बरनी के विचारों में धार्मिक कट्टरता साफ दिखाई देती है। इसके साथ ही मध्यकाल में राजतंत्र से जुड़े बरनी के विचार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में राजा को पृथ्वी पर राज्य की सभी शक्तियों और कार्यों का स्त्रोत समझा जाता है। बरनी का विचार है कि राजा अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए जो भी साधन अपनाता है, वे तब तक सही है जब तक उसका लक्ष्य धर्म की सेवा होता है। Solved Assignment / Notes – contact us – 8851761957 (What’s app only)

बरनी के अनुसार बादशाह को अपने राज्य के शासन के लिए स्वयं को इस प्रकार समर्पित कर देना चाहिए कि जिससे वह ईश्वर (अल्लाह) के समीप पहुँच सके। धर्म और राज्य का कल्याण एक अच्छे राज्य का आदर्श होना चाहिए। प्रशासन को चलाने के लिए नौकरशाही की आवश्यकता पड़ती है और बरनी कुलीन तंत्र का समर्थक है। वह अकुलीन व्यक्तियों की पदोन्नति का प्रबल रूप से विरोधी हैं। बरनी का मानना है कि सल्तनत दो स्तंभों – प्रशासन और विजय पर आधारित है और सेना पर ये दोनों स्तंभ टिके हुए हैं। वह आंतरिक सुरक्षा और विदेशी संबंधों के बारे में सुल्तान के सरोकार पर बल देता है।

बरनी के अनुसार, शरियत लागू करने के साथ – साथ न्याय प्रदान करना भी सुल्तान का एक अनिवार्य कर्तव्य है। कानून लागू करना और कानून का पालन राजा का प्राथमिक उदेश्य होना चाहिए। बरनी ने कानून के चार स्त्रोत बताए हैं :(क) कुरान, (ख) हदीस, {हज़रत पैगम्बर की परम्पराएँ}, (ग) इज़मा, (घ) कियास। इसके लिए उन्होंने ज़वाबित अथवा राज्य के कानून को राज्य का प्रशासन चलाने में एक महत्वपूर्ण स्त्रोत बताया।

बरनी व्यक्तिगत अधिकारों अर्थात पत्नी, बच्चों, पुराने नौकरों, गुलामों आदि के अधिकारों की मान्यता के बारे में भी बात करता है और वह लोगों के अधिकारों की मान्यता को राज्य का आधार मानता है। दंड को राज्य में अनुशासन बनाए रखने का अनिवार्य साधन माना गया है। बरनी दंड की विभिन्न परिस्थितियों विशेषकर सुल्तान द्वारा दिए जाने वाले दंड का उल्लेख करता है।

आइने अकबरी :- (अबुल फज़ल) सोलहवीं शताब्दी में भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण चिंतकों में एक है। वह एक महान विद्वान था जिसे मुस्लिम और हिन्दू परम्पराओं में ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में गहरी जानकारी थी। उसने अकबर के विभिन्न राजनीतिक विचारों के निर्माण में योगदान किया था। अबुल फज़ल राजसी शक्ति के दैवी स्वरूप के विचार से प्रभावित था। उसने सच्चे बादशाह और एक स्वार्थी शासक के बीच भेद बताया। एक सच्चे राजा को अपने बारे में नहीं सोचना चाहिए बल्कि लोगों की भलाई उसका मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।

उसके लिए एक सच्चा शासक एक पिता की तरह होना चाहिए जो जन कल्याण के लिए शासन करता है और जिसका मार्गदर्शन अल्लाह का कानून करता है। हालाँकि अबुल फज़ल ‘राजसत्ता के दैवी प्रकाश’ में विश्वास करता था, फिर भी उसने दैवी आदेश संप्रेषित करने के लिए मध्यस्थों हेतु कोई भूमिका नहीं बताई है। अबुल फज़ल का कहना है कि ‘राजसत्ता अल्लाह से निकलने वाला प्रकाश है और सूर्य की कीरण है। किसी भी मध्यस्थ की सहायता के बिना इसे अल्लाह बादशाहों के साथ संप्रेषित करता है।

‘ हिन्दू धर्म में ब्राह्मणों की तरह उलेमाओं और मुज़ताहिदों ने बादशाह के लिए प्रथागत कानूनों के एक विशेषज्ञ और व्याख्याकार का काम किया। परन्तु अबुल फज़ल के विचार में मध्यस्थों को धार्मिक और पवित्र कानून की व्याख्या करने की अपेक्षा की जाती है। उसके राजनीतिक विचारों के पीछे, यह विश्वास था कि बादशाह को सर्व कल्याण के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए और अपने राजसी कर्तव्य को पूरा करना चाहिए। वह पवित्र कानून के परे भी जा सकता था।

यदि प्राचीन राजनीतिक चिंतन से तुलना की जाए, तो यह शासन के मामलों में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था। गैर – मुस्लिमों से एकत्र किए जाने वाले ज़ज़िया और गोहत्या पर लगे प्रतिबंध के माध्यम से अकबर द्वारा जो सुधार लागू किए गए, उनसे नए राजनीतिक सिद्धांत की भावना का पता चला जिसका उल्लेख आइने अकबरी में मिलता है। अबुल फज़ल मजबूत केन्द्रीयकृत राजतंत्रीय शासन में विश्वास करता था और बेहतर शासन के लिए उसने विभिन्न विभागों में काम के बंटवारे का समर्थन किया।

उच्च केन्द्रीयकृत नौकरशाही की सहायता से ही मुगल शासन ने पूरे साम्राज्य पर शासन किया। अबुल फज़ल ने समाज को चार सोपानीय व्यवस्था में वर्गीकृत किया जिसमें शासक और योद्धा प्रथम श्रेणी में आते थे। दूसरी श्रेणी में विद्वानों, तीसरी श्रेणी में दस्तकारों और व्यापारिक और चौथी श्रेणी में श्रमिकों को रखा गया। इस प्रकार आइने अकबरी से निकलने वाली राजनीतिक सत्ता की तस्वीर एक केन्द्रीयकृत राजतंत्र थी और राज्य का नियंत्रणकारी सिद्धांत लोगों की भलाई था।

निष्कर्ष :- मध्यकालीन भारत में राज्य और संप्रभुता कि जानकारी हमें दो महत्वपूर्ण इतिहासिक पुस्तकों से मिलती हैं – (1) फतवा – ए जहांदारी
(2) आइने अकबरी, फतवा – ए – जहांदारी बरनी के द्वारा लिखी गई जो हमें उस समय के राजतंत्र को दर्शाता है। बरनी के सभी विचार इस्लाम के इर्द-गिर्द घूमते नजर आते हैं। बरनी अपने विचारों के विचारों में धार्मिक कट्टरता दिखाई देती है। बरनी एक यह बताता है कि एक राजा को कैसा होना चाहिए और उस के क्या कार्य और कर्तव्य है।

बरनी के विचार हमें बताते हैं कि उस समय शासन का आधार शरियत, कुरान था और किसी के अनुसार राजा शासन करता था। बरनी कुलीनों का समर्थन करता है और राज्य में एक दंड व्यवस्था की भी बात करता है। मध्यकालीन भारत की दूसरी झलक हमें आइने अकबरी में मिलती है। आइने अकबरी अबुल फज़ल द्वारा लिखी गई। अबुल फज़ल अकबर के राजनीतिक विचारों का निर्माण करता था।

आइने अकबरी में उस ने एक अच्छे शासक और बूरे शासक का भेद बताया। अबुल फज़ल कहता है कि राजा को केवल अल्लाह की राह पर चलना चाहिए। अबुल फज़ल यह कहता है कि एक राजा और अल्लाह के बीच कोई तीसरा या मध्यस्थ नहीं आ सकता। अबुल फज़ल बेहतर शासन व्यवस्था के लिए सामाज को चार व्यवस्थाओं में बांटता है – योद्धा, विद्वान, दस्तकार और व्यापारि, और सब से आखिर में श्रमिकों को।

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