MPSE 007 Solved Assignment 2020

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MPSE 007 भारत में सामाजिक आंदोलन और राज्य
Solved Assignment 2020
Social Movement And Politics

30 April 2020 / 30 September 2020

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Title – MPSE 007 भारत में सामाजिक आंदोलन और राज्य
Solved Assignment 2020
Social Movement And Politics

University – Ignou

Assignment Types – PDF, SOFT COPY /Handwritten on order

Course – MPS (MASTER IN POLITICAL SCIENCE)

Medium / Language – HINDI MEDIUM / ENGLISH MEDIUM BOTH AVAILABLE

Session – JULY 2019, JANUARY 2020

Subjects code – MGP004

Assignment Submission Date – July 2019 session के लिए – 30 April 2020, January 2020 session के लिए – 30 September 2020.

MGPE 013 Solved Assignment 2020 

Q. 2 भारत में श्रमिक और कृषक वर्ग पर वैश्वीकरण के प्रभाव की व्याख्या कीजिए

उत्तर –

वैश्वीकरण का अर्थ
वैश्वीकरण अर्थव्यवस्था के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के स्थान पर बाजार आधारित व्यवस्था (जिसको एकीकृत विश्व आर्थिक व्यवस्था में बदला जा सके) का पक्षपात है। भूमण्डलीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जो यह मानती है कि राज्य को अपनी शक्ति को बाजार के हवाले कर देना चाहिए तथा अपनी शक्तियों में उत्तरोत्तर कमी करनी चाहिए। राज्य आधारित विकास लोगों के गले उत्तर नहीं पाए हैं तथा इसकी आलोचना विश्व की प्रत्येक जगह होने लगी है। वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है जो सूचना – तंत्र के विकास के द्वारा सामाजिक सम्बन्ध पहले से दूरी रहित और सीमा रहित होते जा रहे हैं, लेकिन इस प्रक्रिया से सबसे अधिक खतरा राष्ट्रीय सम्प्रभुता को है। अत : भूमण्डलीकरण के खिलाफ और समर्थन में सामाजिक आन्दोलन हुए हैं। भारत के सन्दर्भ में इसकी काफी आलोचना भी हुई है, लेकिन वैश्वीकरण की प्रक्रिया का विकल्प भारत सहित दुनिया के तमाम देशों को नहीं मिल पाया है। अतः इसके सन्दर्भ में होने वाले सामाजिक आन्दोलन का चरित्र स्थानीय, राष्ट्रीय या पूरे विश्व – भर की दृष्टि निर्धारित हो सकती है।

वैश्वीकरण के प्रभाव
वैश्वीकरण के समर्थकों का कहना है कि इसके द्वारा विश्व के समस्त देशों का विकास किया जा सकता है। उन देशों में निवेश के द्वारा आर्थिक विकास की दर को बढ़ाया जा सकता है साथ – ही साथ इस प्रक्रिया द्वारा सतत विकास की धारणा भी पूरी हो सकती है। जबकि आलोचक इसे विश्व के अविकसित और विकासशील देशों के लिए हानिकारक मानते हैं, क्योंकि मुक्त सीमापार व्यापार और निवेश विकसित देशों के ही पक्ष में होते हैं। इस प्रक्रिया के द्वारा छोटे – मझौले उद्योगों और कारखानों को भारी कारोबार के सामने दब जाने का अंदेशा है।

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वैश्वीकरण का भारतीय किसानों पर प्रभाव
वैश्वीकरण का भारतीय किसानों पर गम्भीर प्रभाव पड़ा है। कुछ मामलों में भारतीय किसानों को लाभ हुआ, जबकि कुछ मामलों में भूमंडलीयकरण के कारण परेशानी का भी सामना करना पड़ा है। भूमण्डलीकरण के कारण 1991 के बाद भारत में चले आ रहे किसान नीतियों में व्यापक परिवर्तन करना पड़ा। किसानों की समस्या को लेकर विश्व व्यापार संगठन के सम्मेलनों में विकसित देशों और भारत समेत दुनिया के विकासशील देशों में व अविकसित देशों के मध्य अपने – अपने सदस्य देशों के कृषक हितों के लिए तनाव भी देखा गया और वर्तमान में भी वह तनाव देखने को मिलता है। भारत के किसान और कृषक नीतियों के समर्थक यह मानते हैं कि विश्व व्यापार संगठन के कृषि सम्बन्धित नियम – कानून विकसित देशों के कृषकों को सुरक्षा प्रदान करते हैं, जबकि भारत के किसानों की दुर्दशा इससे बढ़ती जा रही है। भारत के किसान और विकसित देशों के किसानों की समस्याएँ अलग – अलग हैं। अत: अलग – अलग नीतियाँ बनाई जाएँ तो वह भारतीय किसानों के लिए ज्यादा हितकारी है।
सबसे कठिन समस्या किसानों को उर्वरकों और बीजों पर भारत सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी को लेकर है। भारत सहित दुनिया के अधिकांश विकासशील व गरीब देश अपने किसानों की हालत को समझते हुए उर्वरकों और बीजों पर भारी सब्सिडी देते हैं तथा भविष्य में देने की माँग करते आ रहे हैं। विकसित देश हमेशा से इसका विश्व व्यापार के सम्मेलनों में विरोध करते आ रहे हैं, जबकि वास्तव में विकसित देश अपने सम्पन्न किसानों को भारी सब्सिडी देते हैं। अतः यह कानून भारतीय किसानों के पक्ष में नहीं दिखाता।
दूसरी समस्या पेटेन्ट को लेकर है। पेटेन्ट में यह कानून है कि किसान स्वत: संरक्षित बीजों का पेटेंट कराए तथा उन्हीं बीजों का प्रयोग करे। जबकि अमेरिका सहित दुनिया के अनेक विकसित देश भारत में उपजाए जाने वाले अनाजों का पेटेंट करा लेते हैं। जैसे बासमती चावल का पेटेंट, हल्दी व नीम का पेटेंट आदि। साथ ही साथ अगर कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी बीजों का पेटेंट करा लेती है तो प्रत्येक साल अपनी नई फसलों के लिए महँगा बीज खरीदना पड़ता है, जबकि पहले किसान पुराने बीज का ही प्रयोग कर लेते थे। साथ – ही – साथ घरेलू खाद्यान्न मूल्यों में लगातार वृद्धि होती जा रही है जिससे गरीबों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अतः कृषि क्षेत्र में WTO की विषमताओं को लेकर किसान संगठनों व गैर सहकारी संगठनों द्वारा आन्दोलन भी चलाए गए हैं।
लेकिन भारतीय किसानों को कुछ मामलों में भूमंडलीयकरण ने लाभ भी पहुँचाया है। सम्पन्न किसानों को इससे लाभ हुआ है, क्योंकि चीनी, चावल, खाद्य प्रसंस्करण, फूल खेती एवं बागवानी जैसे क्षेत्रों में भारी निवेश हुआ है। इस प्रकार किसानों को बहुधंधी बनाने में वैश्वीकरण ने मदद प्रदान की है। अब फूड प्रोसेसिंग और प्रोसेसिंग के द्वारा किसान अपने उत्पादों को लम्बे समय तक बाजार में रख सकते हैं। कुल मिलाकर वैश्वीकरण ने किसानों की आमदनी बढ़ाने में सहायता की है, लेकिन भारत के सन्दर्भ में कटु सत्य यह है कि इन सबका लाभ बड़े किसानों या सम्पन्न किसानों को मिला है, जबकि वैश्वीकरण की भार से छोटे – मझौले किसानों को भारी नुकसान हुआ है।

श्रमिक – वर्ग पर भूमण्डलीकरण का प्रभाव

भूमण्डलीकरण का भारतीय अशिक्षित, अकुशल और विशाल श्रमिकों पर भारी कहर बरपाया है और इसी कारण श्रमिक आन्दोलन के सामने कठोर चुनौतियाँ भी आई हैं। भूमण्डलीकरण की एक प्रक्रिया निजीकरण का इसमें महत्वपूर्ण योगदान है। निजीकरण के द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों से राज्य के मालिकाना हक को खत्म किया जा रहा है और घाटे में चल रहे उद्योगों को या तो बन्द कर दिया जाता है या उनमें विनिवेश करके उसे निजी क्षेत्रों के हाथों में बेच दिया जाता है। इन दोनों कारणों से श्रमिकों की नौकरी अधिकांश जगह लगभग खत्म – सी हो गई है। अब नियमित कर्मचारियों की जगह अस्थायी कर्मचारियों और श्रमिकों की भर्ती पर चह रही है। अत : बेरोजगार श्रमिकों के लिए भूमण्डलीकरण बेरहम ही सिद्ध हुआ है। नई आर्थिक नीतियों पर संघों द्वारा एकजुट विरोध न किए जाने के कारण भी श्रमिकों को घाटा हुआ है। विचारकों का मत है कि मजदूर संघों को निजीकरण के विरोध की जगह श्रमिकों के हितों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, क्योंकि निजीकरण आज की महत्वपूर्ण सच्चाई है तथा इससे कोई भी देश अछूता नहीं रह सकता।

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