MPSE 008 Solved Assignment 2020

MPSE 008 Solved Assignment 2020

MPSE 008 Solved Assignment 2020

MPSE 008 भारत में राज्य राजनीति
State Politics In India
Solved Assignment

2019-2020 pdf in Hindi / English Medium
31 March 2020 / 30 September 2020

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Title – MPSE 008 भारत में राज्य राजनीति
State Politics In India

University – Ignou

Assignment Types – PDF, SOFT COPY /Handwritten on order

Course – MPS (MASTER IN POLITICAL SCIENCE)

Medium / Language – HINDI MEDIUM / ENGLISH MEDIUM BOTH AVAILABLE

Session – JULY 2019, JANUARY 2020

Subjects code – MPSE 008 

Assignment Submission Date – July 2019 session के लिए – 30 April 2020, January 2020 session के लिए – 30 September 2020.

MPSE 008 Solved Assignment 2019 – 2020 in hindi medium

 

प्र. 1 राज्य राजनीति के अध्ययन के लिए प्रणालीगत और उत्तर – आधुनिकतावादी दृष्टिकोण की तुलना कीजिए।

उतर –
भूमिका :- प्रणालीगत और उत्तर – आधुनिकतावादी दृष्टिकोण राज्य राजनीति के विश्लेषण हेतु सर्वाधिक प्रयोग किए जाने वाले दृष्टिकोण में से हैं। अन्य दृष्टिकोण – संरचनात्मक, प्रकार्यात्मक, आधुनिकीकरण या विकासात्मक दृष्टिकोण, मार्क्सवादी दृष्टिकोण। 70 के दशक में यही दो दृष्टिकोण प्रबल रहे – प्रणालीगत और उत्तर – आधुनिकतावादी।

सामाजिक विज्ञानों में व्यावहारिक आन्दोलन के एक भाग के रूप में यह दृष्टिकोण राजनीतिक वैज्ञानिकों द्वारा राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तनों और क्रम का अध्ययन करने हेतु अपनाया था। मूल रूप से अमेरिका में विकसित यह दृष्टिकोण उन देशों की राजनीति का अध्ययन करने हेतु प्रयुक्त हुआ, जो औपनिवेशिक शासन से मुक्त हो चुके थे। 1960 में जी. ए. आमण्ड और जे. एस. कोलमॅन ‘द पाॅलिटिक्स आॅफ डवलपिंग एरियाज’ के प्रकाशन के उपरान्त इन देशों में यह काफी प्रचलित हो गया। सर्वांगीण दृष्टिकोण के मूल अभिलक्षण निम्नलिखित है –

MPSE 008 Solved Assignment In hindi medium
राजनीतिक गतिविधियों की इकाई राजनीति व्यवस्था होती है। इसमें सम्मिलित हैं – राजनीतिक संस्थाएँ, दृष्टिकोण तथा प्रक्रियाएँ, व्यवस्था के विभिन्न घटक दृष्टिकोण। संस्थाएँ स्वयं को सम्मिलित एवं प्रतिसंतुलित करती हुई, परस्पर अन्तक्रिया, संघर्षरत समन्वय करती करती है। ये प्रक्रियाएँ एक राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में होती है। ऐसी स्थिति में राजनीतिक व्यवस्था स्वत : स्थापित होती रहती है, जो भंग नहीं होती और तदनुसार लोचदार होती है।

MPSE 007 SOLVED ASSIGNMENT 2020 HINDI MEDIUM 

प्रणालीगत दृष्टिकोण

प्रणालीगत दृष्टिकोण (व्यवस्थित दृष्टिकोण) उन दो दृष्टिकोणों में से एक है जो राज्यीय राजनीति के विश्लेषण हेतु सर्वाधिक सर्वमान्य रूप से प्रयोग किए गए हैं। इसे संरचनात्मक – प्रकार्यात्मक, आधुनिकीकरण अथवा विकासात्मक दृष्टिकोणों, द्वारा भी जाना जाता है। इस प्रकार का दूसरा दृष्टिकोण है – मार्क्सवादी। वस्तुतः 70 के दशक तक यही दो दृष्टिकोण प्रबल थे। परन्तु ये दो दृष्टिकोण किसी रूप में प्रयोग किए जाते ही रहे।

कुछ परवर्ती दृष्टिकोण इन दो मुख्य दृष्टिकोणों – व्यवस्थित दृष्टिकोण एवं मार्क्सवादी दृष्टिकोण – की ही शाखाएँ हैं। इसके अलावा, कुछ विद्वानों ने एक ही समय में दृष्टिकोण के मिश्रण को भी प्रयोग किया है।

सामाजिक विज्ञानों में व्यावहारिक आन्दोलन के एक हिस्से के रूप में यह दृष्टिकोण राजनीति वैज्ञानिकों द्वारा राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तनों एवं क्रम का अध्ययन करने के लिए अपनाया गया। मूल रूप से अमेरिका में विकसित यह दृष्टिकोण उन देशों की राजनीति का अध्ययन करने के लिए प्रयुक्त हुआ जो औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुए थे। 1960 में जी. ए. आमण्ड एवं जे. एस. कोलमॅन द पाॅलिटिक्स आॅफ डिवैलपिंग एरिआज के प्रकाशन के बाद इन देशों में यह काफी प्रचलित हो गया। सर्वांगी दृष्टिकोण के मूल अभिलक्षण निम्नलिखित है :

राजनीति गतिविधियों की इकाई राजनीतिक व्यवस्था होती है। राजनीतिक व्यवस्था में आती है – राजनीतिक संस्थाएँ / दृष्टिकोण एवं प्रक्रियाएँ। इस व्यवस्था के विभिन्न घटक दृष्टिकोण / संस्थाएँ स्वयं को संतुलित एवं प्रतिसंतुलित करती हुई, परस्पर अन्तक्रिया, संघर्ष एवं समन्वय करती रहती है। ये प्रक्रियाएँ एक सामाजिक एवं राजनीतिक वातावरण में होती है। ऐसी स्थिति में राजनीतिक व्यवस्था अपने आप रहती है। यह भंग नहीं होती। राजनीतिक व्यवस्था तदनुसार लोचदार होती है।

अनेक विद्वानों ने भारतीय राजनीति का अध्ययन करने के लिए व्यवस्थित दृष्टिकोण को अपनाया है। इसको संपूर्ण देश की राजनीति के साथ – साथ राज्यीय राजनीति के अध्ययन के लिए भी प्रयोग किया गया है। इसके भारत – स्तरीय राजनीति हेतु प्रयोग का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है – रजनी कोठारी कृतज्ञ पाॅलिटिक्स इन इण्डिया। राज्यीय राजनीति को अध्ययन के विशिष्ट कार्यक्षेत्र की मान्यता मिलते ही व्यवस्थित दृष्टिकोण को अनेक वैयक्तिक विद्वानों द्वारा राज्य – विशेष अथवा राज्य – समूह के अध्ययनों के अवसर पर प्रयोग किया जाने लगा।

उन्होंने राज्यीय राजनीति के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया। इन पहलुओं में मुख्य रूप से शामिल थे – राजनीतिक दल, दलों के भीतर स्वार्थी गुट, जाति, धर्म, भाषा, नेतृत्व, चुनाव, दबाव समूह, आदि। इन पहलुओं को राजनीतिक व्यवस्था की उप – व्यवस्था के रूप में भी लिया गया। दो विषय जो अध्ययनों के सबसे महंगे महत्वपूर्ण अंग गिने जाते हैं, वे हैं – राजनीतिक दल एवं जाति। पाॅल ब्राॅस तथा रिचर्ड सिसन ने व्यवस्थित दृष्टिकोण को प्रयोग कर क्रमशः उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान में कांग्रेस का अध्ययन किया है।

रिचर्ड सिसन ने कांग्रेस के संस्थानीकरण का अध्ययन किया यथा आधुनिक संस्था – राजनीतिक दल – की पारंपरिक जाति – व्यवस्था के प्रति अनुकूलता। रजनी कोठारी दरअसल, कांग्रेस पार्टी का प्रत्ययीकरण ‘कांग्रेस प्रणाली’ के रूप में कर चुकी थी। कांग्रेस ने अपने भीतर गुटबाजी के प्रति अनुकूलन में लचीलापन दर्शाया था। अग्रलिखित व्यवस्थित दृष्टिकोण के व्यवहार संबंधी कुछ उदाहरण हैं।

जाति ने समाजशास्त्रियों की ही भाँति राजनीति वैज्ञानिकों का भी ध्यान आकृष्ट किया। विकासशील अथवा परंपरागत समाजों को समझने के प्रयास में उन्होंने आधुनिकता एवं परंपराओं के बीच अन्तक्रिया को पूरी तरह से समझने के लिए अथक परिश्रम किया। आधुनिकता को आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं एवं प्रक्रियाओं से पहचान मिली, यथा – निर्वाचित सरकार, राष्ट्र – राज्य, आधुनिक नेतृत्व या अभिजात वर्ग, सार्वभौम व्यस्क मताधिकार, पार्टियाँ, चुनाव, आदि, जो कि नव – अनोपनिवेशीकृत देशों के लिए नए थे। दूसरी ओर, परंपरा को पहचान मिली जाति, धर्म, जनजाति, आदि आरोप्य अथवा आदिम सहज – गुणों से।

आधुनिकता – चुनाव, राजनीतिक दल, आदि और जाति जैसी परम्परा के बीच अन्तक्रिया का अध्ययन करते हुए रजनी कोठारी तर्क देते हैं कि जाति और राजनीति के बीच अन्तक्रिया एक द्वि – मार्गी प्रक्रिया है, जाति और राजनीतिक दोनों एक – दूसरे को बदल डालती है। जाति इस प्रक्रिया में परंपरावादी अथवा रीतिबद्ध भूमिका अब और नही निभाया रहती वह अब धर्मनिरपेक्ष हो चुकी है।
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उत्तर – आधुनिकतावादी दृष्टिकोण

भारत में अनेक महत्वपूर्ण राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन परिवर्तन हुए हैं। इन परिवर्तनों का संकेत उन्नतशील भूमण्डलीय, लोकतंत्रीयकरण, विकेन्द्रीकरण, जाति, धर्म व नृजाति पर आधारित पहचानों का प्रकटन एवं अभिकथन, तथा नये सामाजिक आन्दोलनों से मिलता है। इस घटनाक्रम को अनेक पहलुओं से देखा – समझा जा सकता है *जिनमें व्यवस्थित एवं मार्क्सवादी पहलू शामिल हैं। कुछ विद्वान एक से अधिक दृष्टिकोणों का संकरण कर रहे हैं।

परन्तु कुछ विद्वानों में यह समझ बढ़ रही है कि इस समय तक उपलब्ध दृष्टिकोण राजनीति के ने अभिलक्षणों को स्पष्ट करने में सक्षम नहीं है। वे वैकल्पिक दृष्टिकोण अपनाते हैं, जिन्हें “उत्तर – आधुनिकतावादी” दृष्टिकोण कहा जाता है। ल्योतार्द जैसे दार्शनिकों की कृतियों से प्रेरित, उत्तर – आधुनिकतावाद अनेक विचारधाराओं के लिए विश्लेषण संबंधी एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण बन गया है।

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उत्तर – आधुनिकतावादी दृष्टिकोण के अनुयायी जन समाज में संकटकाल के लिए विकास की आधुनिकतावादी युक्ति व उसके प्रतीक विचारों को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनके अनुसार, आधुनिकतावादी युक्ति ने लघुतर पहचानों, परम्पराओं एवं देशज विद्या – पद्धति को स्वायत्तता प्रदान नहीं की है। उत्तर – आधुनिक परिप्रेक्ष्य का प्रयोग पहचानों, सामाजिक आन्दोलनों एवं पराकाष्ठाप्राप्त सामाजिक संघर्षों अथवा नृजातीय साम्प्रदायिक दंगों के भी इन दिनों उठ खड़े होने के कारण जरूरी हो गया है।

वे विद्वान जो उत्तर – आधुनिकतावादी दृष्टिकोण का प्रयोग करते हैं, परम्पराओं, सतत विकास और देशज ज्ञान में आधुनिकता का विकल्प पाते हैं। आधुनिकता के विरोध के कारण गाँधीवादी, समाजवादी, “गैर – पारंपरिक” मार्क्सवादी पर्यावरणविद्, आदि एक साझा पर आएँ। ऐसे आन्दोलन – आधुनिकता से मोहभंग व किसी विकल्प की तलाश – को उत्तर- आधुनिकतावाद कहा जाता है। उत्तर – आधुनिकतावादी दृष्टिकोणों का प्रयोग पहचानों, उपद्रवों, सामाजिक आन्दोलनों के अध्ययन हेतु होता है। इनका प्रयोग विभिन्न विचारधाराओं के विद्वानों द्वारा किया जाता है।

कुछ विद्वानों के बीच यह समझ बढ़ रही है कि राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन विश्लेषण की वृहद् इकाई – राष्ट्र – राज्य, राजनीतिक व्यवस्था, दलीय प्रणाली, जाति – व्यवस्था, आदि – के रूप में किए जाने पर आधुनिकीकरण योजना का प्रभाव पड़ा है। जबकि व्यवहार में आधुनिकीकरण अथवा आधुनिकता की राजनीति किसी राजनीति इकाई के अवयवों को पर्याप्त स्वायत्तता नहीं देती, शास्त्रीय अध्ययनों में आधुनिकीकरण योजना अथवा आधुनिकता का प्रभाव इन अवयवों की उपेक्षा में दिखाई देता है। विश्लेषण के इस प्रकार के दृष्टिकोण से अलग होने के लिए अनेक विद्वजन उनकी स्वायत्तता को स्वीकार करने के लिए वृहद् इकाइयों के खंडों का अध्ययन किए जाने की आवश्यकता पर बल देते हैं।
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निष्कर्ष :- दृष्टिकोण सामाजिक यथार्थ के अध्ययन हेतु आवश्यक उपकरण हैं। राजनीति के अध्ययन के लिए कुछ प्रमुख दृष्टिकोण होते हैं। ये हैं – व्यवस्थित, मार्क्सवादी, नव – मार्क्सवादी, उत्तर – आधुनिकतावादी, चुनावों के अध्ययनार्थ दृष्टिकोण आदि। व्यवस्थित दृष्टिकोण विश्लेषण की राजनीतिक इकाई को एक व्यवस्था बतौर लेता है।

उसका तर्क है कि हर व्यवस्था में विभिन्न घटक होते जो एक – दूसरे से संघर्ष करते रहते हैं। इस प्रक्रिया में व्यवस्था अपने आपको कायम रखती है, वह चुनौतियों एवं परिवेश को अपने अनुकूल बनाती है। दूसरी ओर, मार्क्सवादी दृष्टिकोण का कहना है कि राजनीति समाज में वर्ग – संबंधों का प्रकटीकरण है। राजनीति की प्रकृति किसी समाज में आर्थिक प्रतिवादों की प्रकृति पर निर्भर होती है। परन्तु इन परिवर्तनों के समर्थन यह स्वीकार करते हैं राजनीति को प्रभावित करने में अर्थव्यवस्था महत्वपूर्ण है परन्तु आर्थिक कारक भी बड़े महत्व के हैं।

परवर्ती की अपनी सापेक्ष स्वायत्तता भी होती है। इन परिवर्तनों के साथ मार्क्सवादी दृष्टिकोण को नव – मार्क्सवादी दृष्टिकोण के नाम से जाना जाता है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि ये दृष्टिकोण स्थानीय राज्यीय अथवा राष्ट्रीय स्तरों पर राजनीतिक विश्लेषण की इकाई के लिए खासकर नहीं है। ये किसी भी इकाई – स्थानीय, राज्यीय अथवा राष्ट्रीय – हेतु प्रयोग किए जा सकते हैं क्योंकि राजनीति के विभिन्न पहलू राज्यों में ही दिखाई देते हैं। वास्तव में, राज्यीय राजनीति का कोई एकरूप प्रतिमान नहीं है। इस प्रसंग में ये दृष्टिकोण विशेष महत्व के हो जाते हैं।

 

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