Social Reforms and hindu Renaissance

Social Reforms and hindu Renaissance in India

Social Reforms and hindu Renaissance

 

प्र.  19वीं सदी के भारत में सामाजिक सुधार और हिंदू नवजागरण पर एक लेख लिखें।

भूमिका :-  Social Reforms and hindu Renaissance आधुनिक भारतीय विचारधारा को दो प्रावधानों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम सामाजिक सुधार और द्वितीय, राष्ट्रवादी प्रावस्था। अधिकांश विद्वान इन्हें दो भिन्न प्रवक्ताओं के रूप में देखते हैं। अतः आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचारधारा के इतिहास पर विचार करने का यह ढंग समस्यात्मक हो सकता है। सामाजिक सुधार की बहुत – सी समस्याएँ भिन्न – भिन्न रूपों में हैं और राष्ट्रीय प्रावधान में निरंतर बनी बनी हुई है। वास्तविकता में स्वयं राष्ट्रीय प्रावस्था में इस सम्बन्ध में दो बहुत स्पष्ट प्रवृत्तियाँ प्रकट हुई। दूसरी ओर प्रमुख राष्ट्रवाद है, जिसका प्रतिनिधित्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा मुख्य रूप से किया गया है और इसमें सामाजिक सुधार का एजेंडा प्रमुख रुप से छोड़ा गया है।
मौटै तौर पर आधुनिक भारतीय विचारधारा को दो प्रावधाओं में विभाजित कर सकते। पहली प्रावस्था थी जिसे प्रायः “सामाजिक सुधार” की प्रावस्था कहा जाता है। देशी समाज के आंतरिक पुनरुद्धार से अधिक संबंधित हैं और क्योंकि इसकी पहली बहुबुदाहट बंगाल में उत्पन्न हुई थी, इसे प्राय : “बंगाल पुनर्जागरण” कहा जाता था। राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने, वास्तव में, यहाँ तक कि इसे भारतीय पुनर्जागरण के रूप उल्लेख करना आरंभ किया, परन्तु उन कारणों से यह सही विवरण नहीं होगा जिन पर हम शीघ्र ही चर्चा करेंगे। दूसरी प्रावस्था अधिक जटिल और कई तरीकों में संरचित है, यह वह प्रावस्था है जिसे हम राष्ट्रवादी प्रावस्था का नाम दे सकते हैं। इस प्रावस्था में चिन्ताएँ निर्णायक रूप से राजनीतिक और सत्ता के प्रश्नों पर और औपनिवेशिक शासक से स्वतंत्रता के प्रश्नों पर चली जाती है।

Social Reforms and hindu Renaissance

सामाजिक सुधार और “हिन्दू पुनर्जागरण”

पूरी उन्नीसवीं शताब्दी में विशेषकर बंगाल और पश्चिम भारत में बौद्धिक कार्यकलापों का वास्तविक विस्फोट हुआ था। बंगाल में युवा बंगाल आन्दोलन था, और पत्रकार, विचारक और समाज सुधारक, जैसे राजा राममोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, केशवचन्दर सेन, माइकिल मधुसूदन दत्त, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी स्वामी विवेकानंद और ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने इस बहुबुदाहट को मूर्त रूप रूप दिया। पश्चिम भारत में समाज सुधारक थे, जैसे बाल शास्त्री जम्भेकर, ज्योतिराव फूले, रामकृष्ण गोपाल भंडारकर, गोपाल गणेश आगरकर और स्वामी दयानंद सरस्वती और ऐसे कई अन्य महापुरुष थे जिन्होंने प्रत्यक्ष रूप से भारतीय समाज के आंतरिक पुनरुद्धार का प्रश्न हल किया। उन्होंने अपने स्वयं के समाज के पिछड़ेपन को सामने लाने के उद्देश्य से उसकी कटु आलोचना की। जैसा कि राममोहन राय ने इसके बारे में कहा “यह अंध विश्वास के घने बादल” थे जो पूरी धरती के ऊपर मंडरा रहे थे, और इसी ने उसे सबसे अधिक चिन्तित किया। इसके फलस्वरूप उसे विश्वास हुआ कि बहुविवाह प्रथा और शिशु हत्या बहुत प्रचलित थी और बंगाली महिला की स्थिति “अन्तहीन दमन ओर दुर्दशा की थी।” दयानंद सरस्वती जैसे विचारकों ने मूर्तिपूजा और पुरोहित प्रपंच को ज्ञान की लालसा के विनाश के लिए उत्तरदायी माना। उनका विश्वास था कि ये अन्य प्रथाओं की तरह थी जिन्होंने हिन्दुओं को भाग्यवादी और अकर्मण्य बना दिया। वे मुद्दे जिन्होंने समाज सुधारकों की चिन्ताओं को बढ़ावा, मुख्यतया भारतीय समाज में महिलाओं की प्रस्थिति से संबंधित थी। सती, विधवा विवाह और नारी शिक्षा ऐसे मुख्य मुद्दे थे जिन्हें समाज सुधारकों ने उठाया। इसके लिए उन्होंने परम्परा की पुन : व्याख्या की, प्राय : परम्परागत व्यवहारों की भर्त्सना की और यहाँ तक कि सती जैसी बहुत घृणित प्रथाओं में से कुछ पर प्रतिबंध लगाने के लिए औपनिवेशिक सरकार से कानून बनाने का अनुरोध किया।

यह कहना अनावश्यक है, यद्यपि महिलाओं की स्थिति प्रमुख चिन्ता का मामला है परन्तु समान रूप से अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न भी है – जाति भेदभाव और छुआछूत इन सुधारकों में से बहुतों की यह आलोचना का विषय रहा है फिर भी, आपको ध्यान में रखना चाहिए कि जाति के प्रति उनका दृष्टिकोण ज्योतिबा फूले और बाद में डाॅ. अम्बेडकर जैसे सुधारकों से भिन्न था। वे डाॅ. अम्बेडकर की भांति निचली जातियों का उद्धार नहीं चाहते थे। परन्तु हिन्दू समाज की समाज की मुख्यधारा में उनका आत्मसात करना चाहते थे। अधिकांश समाज सुधारकों का मानना था कि न केवल हिन्दू समाज भ्रष्ट हुआ है, बल्कि सैकड़ों भिन्न भिन्न समुदायों और जातियों में पृथक हुआ है और विभाजित हुआ है, इससे यह किसी प्रकार की “उभय इच्छा” विकसित करने में अक्षम बन गया। इसलिए हिन्दू समाज की एक ही समुदाय में पुन :संस्थापित या पुनर्गठित करने की आवश्यकता है। अतः स्वामी विवेकानंद अथवा दयानन्द सरस्वती ने कुछ कुछ क्रिश्चियन चर्च की तरह पुनर्गठन करने का प्रयास किया, जैसा कि आशीष नन्दी सुजाता है। यदि विवेकानंद स्पष्टवादी थे कि कोई भी अन्य समाज “नीच व्यक्ति के गले पर इतनी निर्दयता से अपने पाँव नहीं रखता है जितना भारत में होता है।” दयानन्द सरस्वती ने जाति की पुन : परिभाषा इस तरीके से करने का प्रयास किया जिससे केवल जन्म आधार पर निर्धारित करना समाप्त हो। उन्होंने व्यक्ति की जाती प्रस्थिति निर्धारण में व्यक्तिगत प्रवीणता एवं उपलब्धि का मानदंड शामिल करने का प्रयास किया।

राजा राममोहन राय Biography

सुधारकों की दो बौद्धिक चिन्ताएँ

सुधारकों द्वारा किए गए दो स्पष्ट चेष्टाएँ हैं हम याद रखना चाहिए। पहला, उनके आलोचना पश्चिमी उदारवादी विचारधारा को बहुत स्पष्ट रूप सामने लाए। उनमें से अधिकांश ब्रिटिश शासक उन विचारों के जीते जागते प्रमाण थे। इसलिए वे ब्रिटिश शासक के खुले प्रशंसक थे। उदाहरण के लिए, जैसा कि बाल शास्त्री ने इसे देखा, बंगाल पर केवल साठ या सत्तर वर्षों के ब्रिटिश शासन ने उसे पहचान से परे रूपांतरित कर दिया। उन्होंने विगत के “हिन्सा, दमन और कुशासन” के स्थान पर “सुरक्षा और स्वतंत्रता” का माहौल देखा, जहाँ लोग “यूरोप की कला और विज्ञान का श्रेष्ठ ज्ञान” अर्जित करने में सक्षम हुए। जाम्मेकर का कथन, वास्तव में, ब्रिटिश शासन के बारे में पिछले समाज सुधारकों की समझ का अच्छा निरूपण है। यह याद रखा जाना चाहिए कि सुधारवादी विचारों की पहली पीढ़ी ने दुहरी चुनौतियों के सामने अपनी बौद्धिक यात्रा प्रारंभ की। एक ओर, औपनिवेशिक शासक की भारी उपस्थित थी जो न केवल विदेशी सत्ता का बल्कि आधुनिक और “उन्नत” समाज का भी प्रतिनिधित्व कर रहे थे जिन्होंने विचारों विचारों सत्ता का बल्कि आधुनिक और “उन्नत” समाज का भी प्रतिनिधित्व कर रहे थे जिन्होंने विचारों जैसे विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में विस्मयकारी प्रगति की है।

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