Types of India soils

 

Types of India soils |मृदा, soil geography
Geography, soil

Types of India soils

मृदा
प्रकार
निर्माण
क्षेत्रफल
राज्य क्षेत्र
उपलब्धता
फसल उत्पादन

मृदा :- मृदा एक बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन हैं।

मृदा पृथ्वी पर जीवन का आधार हैं।

मृदा खनिजों तथा जैविक पदार्थों का सम्मिश्रण है इस मे पौधों को वहन करने की क्षमता होती हैं।

निर्माण :- मृदा निर्माण एक जटिल और सतत प्रक्रिया है। मृदा निर्माण अपक्षय तथा निक्षेपन क्रियाओं द्वारा होता है। चट्टानों के विखण्डन तथा नियोजन के प्रतिफल के रूप में मृदा का निर्माण होता हैं।

प्रभावित करने वाले कारक :- मूलभूत पदार्थ, जलवायु,उच्चवच, जैविक कारक तथा समय।

मृदा के घटक :- खनिज कण, हुमस, वायु तथा जल।

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 मृदा के प्रकार

भारत में मृदा को 8 मुख्य भाग तथा 27 उप-भाग में विभाजित किया गया है। यह विभाजन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा 1986 में किया गया था।

भारतीय मृदाओ का विभाजन उस के उत्पत्ति, रंग, संयोजन, अवस्थित के आधार पर किया गया है।

(1) जलोढ़ मृदाएं

* इस मृदा का वितरण सबसे अधिक हैं।

* 14.25 लाख वर्ग किलोमीटर में यह फैला हुआ हैं।

* यानी 43.4 प्रतिशत क्षेत्र में।

* यह मृदा अत्यधिक जनसंख्या वाला क्षेत्र हैं।

* यह एक अच्छा कृषि उत्पादक क्षेत्र हैं।

* इसे अमण्डलीय मृदा भी कहते हैं।

* इस का निर्माण नदियों के जल द्वारा बहा कर लाए अपरदित अवसाद के निक्षेपन से होता हैं।

* यह उतरी भारत, पंजाब, बह्मपुत्र घाटी तथा केरल डेल्टाई क्षेत्रों में फैला हुआ हैं।

* यह मृदा भूरे रंग तथा राख के  रंग जैसी होती हैं।

* इस मृदा में पोटाश, फास्फोरस एसिड तथा चूने की प्रचुरता पाई जाती हैं।

* इस मृदा में नाइट्रोजन तथा जैविक पदार्थों की कमी होती  हैं।

* यह मृदा सिंचाई के लिए उपयुक्त हैं।

* चावल, गेहूं, गन्ना, कपास, चना, मक्का, तिलहन, दलहन,  जूट तथा फल और सब्जियों का उत्पादन इस मृदा में किया जाता है।

इस मृदा को दो उप-भागो में बाँटा जाता है :-

 खादर :- नदी के बाढ़ के द्वारा मैदानी क्षेत्रों में मृदा की जो परत जमा हो जाती है उसे खादर मृदा कहते हैं। यह हल्के भूरे रंग का होता है इस मृदा में चुना पदार्थों की कमी होती है यह मृदा चीकनी होती हैं इसमें नमी अधिक होती हैं।

बांगर :- यह पुराना जलोढ़क होता हैं। इसका जमाव मैदानों से दूर ऊँचाई पर होता हैं यह मृदा गहरे रंग की होती है, इसमें चुनेदार कंकर पाए जाते तथा यह मृदा कम उपजाऊ होती हैं।

(2) लाल मृदाएं

* यह मृदा प्रायद्वीपय पठार के क्षेत्रों में पाया जाता है।

* इसका क्षेत्रफल 6.1 लाख वर्ग किलोमीटर हैं।

* यह देश के 18.6 प्रतिशत भाग पर फैला हुआ हैं।

* यह दूसरा मुख्य मृदा हैं।

* वितरण :- यह मृदा तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश,तेलंगाना, छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड तथा द. पू. राजस्थान में फैला हैं।

* इस मृदा का लाल रंग रवेदार तथा कायांतरित चट्टानों में    लोहे के व्यापक स्तर के कारण होता हैं।

* जलयोजित होने पर यह मृदा पीली दिखाई देती हैं।

* निर्माण :- इस मृदा का निर्माण पूर्व कैम्ब्रिज युग की रवेदार तथा कायांतरित चट्टानों के विखंडन तथा वियोजन से हुआ    है।

* इस मृदा मे लौह, अल्यूमीनियम तथा चूने की प्रधानता होती  हैं।

* नाइट्रोजन, पोटाश, फास्फोरस तथा जीवाश की कमी।

* निचले क्षेत्रों में यह मृदा गहरी रंग की तथा उपजाऊ होती हैं।

* ऊपरी भागो में यह कम उपजाऊ होती हैं।

* उत्पादन :- इस मृदा में  मोटे अनाज, तिलहन, दलहन, तम्बाकू तथा आलू का उत्पादन होता हैं।

(3) काली मृदाएं

इस मृदा को कई नामों से जाना जाता हैं, स्थानीय स्तर पर इसे रेंगर, कपास वाली मृदा,अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उष्णकटिबंधीय चेरमनोजम तथा वर्टीसाल के नाम से जाना जाता है। भारत मे इसे हम काली मृदा के नाम से जानते हैं।

निर्माण :- दक्कन के बेसाल्ट लावा के विखण्न एवं वियोजन से इस मृदा का निर्माण हुआ हैं।

* इस मृदा का क्षेत्रफल 4.98 लाख हेक्टेयर हैं।

* यह 15.2 प्रतिशत भाग पर फैला हुआ है।

* इस का वितरण महाराष्ट्र, द. मध्य प्रदेश, उ. कर्नाटक, प.आंध्र प्रदेश, तथा गुजरात के काठियावाड़ा प्रायद्वीप में हैं।

* इस मे लौहा, चूना, कैल्शियम, पोटाश, एलुमिना तथा  मैग्नीशियम कार्बोनेट की प्रचुरता होती हैं।

* नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा जीवांश की कमी पाई जाती हैं।

* यह मृदा गहरे काले रंग और स्लेटी रंग की होती हैं।

* इस मे क्ले या चीका की प्रधानता होती हैं।

* गीले होने पर यह फूल जाती हैं और चिपचिपी हो जाती हैं।

* सूखने पर सिकुड़ जाती हैं।

* नमी को अधिक समय तक धारण करने की क्षमता होती हैं।

* उत्पादन :- कपास, अरहर, गन्ना,मूंगफली, अलसी, सरसों       तथा शाक-सब्जियों का उत्पादन होता हैं।

(4) लैटेराइट मृदाएं

इस का नाम  :- लैटिन भाषा के शब्द लैटर (later) से हुआ हैं,इस का अभिप्राय ‘ईट’ है।

* भीगने पर यह मृदा मुलायम हो जाती हैं।

* और सूखने पर कड़ी।

* उत्पत्ति :- उच्च ताप, उच्च वर्षण क्षेत्रों में लैटरीकरण की    प्रक्रिया से होता हैं।

* यह मृदा 1.22 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हैं।

* 3.7 प्रतिशत क्षेत्र में।

* इस का वितरण पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, राजमहल की    पहाड़ियां, सतपुड़ा में हैं।

* इस मृदा में नाइट्रोजन, कैल्शियम, फास्फोरस, पोटाश,      चुना,सिलिका जीवांश की कमी होती हैं।

* कम उपजाऊ होती हैं।उन्होंने उत्पादन :- कहवा, चाय, नारियल तथा काजू।

(5) मरूस्थलीय या शुष्क मृदाएं

यह मृदा भारत के राजस्थान, सौराष्ट्र, कच्छ, द. हरियाणा तथा दक्षिण पंजाब में पाई जाती है।

* यह मृदा 1.42 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ हैं।

* इनका गठन बलुई तथा लवणीय हैं।

* इस मृदा में नमी तथा जैविक पदार्थों की कमी होती हैं।

* नाइट्रोजन तथा पोटाश की कमी होती हैं।

* फास्फेट सामान्य मात्रा में पाया जाता हैं।

* इस मृदा में घुलनशील लवणों का अनुपात अधिक होता हैं।

निर्माण :- इस मृदा का निर्माण अपक्षय क्रिया तथा पवनो द्वारा निक्षेपन से होता हैं।

* इस मृदा में  कम उत्पादन होता है इस मे ज्वार, बाजरा, रागी,तथा तिलहन का उत्पादन होता हैं।

(6) पर्वतीय एवं वन मृदाएं

यह मृदा हिमालय के ढालो एवं घाटियों में 2100-3100 मी. की ऊंचाई पर पाया जाता हैं।

* यह अपरिपक्व मृदाएं होती हैं।

* इनका गठन सिल्ट दोमट से दोमट तथा रंग गहरा भूरा होता  हैं।

* यह अम्लीय मृदाएं होती हैं।

* इस मे नाइट्रोजन, पोटाश, फास्फोरस तथा चूने की कमी  होती हैं।

* इस मृदा पर लौह तथा एल्यूमिना की परत मिलती हैं।

* यह मृदा बागनी फसलों के  लिए उपयुक्त हैं।

* इस मृदा के  कई उपवर्ग हैं  जैसे :- पर्वतीय एवं घास के मैदान की मृदाएं, पर्वतीय अवर्गीकृत मृदाएं, गिरिपदीय मृदाएं, वन मृदाएं, पाॅड़जोल मृदाएं, पहाड़ी मृदाएं, धूसर एवं भूरी मृदाएं।

(7) लवणीय तथा क्षारीय मृदाएं

इन मृदाओं की उत्पत्ति शुष्क जलवायु तथा खराब अपवाद की दशाओं में केशिका प्रक्रिया द्वारा सोडियम, कैल्शियम, पोटेशियम एवं मैग्नीशियम के लवणों की सतह पर सफेद परत के रूप में होती हैं।

लवणीय मृदा :- मे सोडियम तथा अन्य लवण पाए जाते हैं।

क्षारीय मृदा :- मे सोडियम क्लोराइड की प्रधानता मिलती हैं।

निर्माण :- इस मृदा का निर्माण अतिरेक वर्षा, बाढ़, अतिरेक सिंचाई, असमतल धरातल तथा प्रभावी वाष्पीकरण की दशाओं में  होता हैं।

* इस का वितरण गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा तटीय डेल्टाई में हैं।

* इस के भी कई उपनाम हैं :- रेह, कल्लर,ऊसर, राकड़, चोपन एवं धुर।

* यह 68,000 वर्ग किलोमीटर में फैला हैं।

* इनका गठन बलुई से दोमट के मध्य हैं।

* इस मृदा में नाइट्रोजन, चूने तथा जैविक पदार्थों की कमी  पाई जाती हैं।

* यह अनउपजाऊ होती हैं।

* वैज्ञानिक तरीके से कृषि के प्रयास किए जा रहे हैं।

(8) पीटमय एवं दलदलीय मृदाएं

* पीटमय मृदा अति आर्द्र प्रदेशों में पाया जाता हैं।

* जैविक पदार्थों के संचयन से इसका निर्माण होता हैं।

* इनके गठन में 20-40 प्रतिशत जैविक पदार्थ होते हैं।

* इस मे घुलनशील लवण होते हैं।

* लवण एवं जैविक पदार्थों की बहुलता होती हैं।

* पोटाश तथा फास्फेट की कमी  होती हैं।

* यह वर्षा काल में जलमग्न होती हैं।

* बाद में इस मृदा में चावल की खेती की जाती हैं।

* इसका वितरण :- केरल, प. बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु के तटीय डेल्टाई क्षेत्रों में पाई जाती हैं।

* यह काली, भारी तथा अम्लीय होती हैं।

* यह मृदा केरल में ‘कारी’ नाम से जानी जाती हैं।

* इसका निर्माण लौह की उपस्थिति तथा जैविक पदार्थों के बदलाव के कारण होता है।

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