What is Socialism | Socialism

What is Socialism | Socialism समाजवाद /साम्यवाद

समाजवाद

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समाजवाद
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प्रकार
शुरुआत
देश
अंत
मान्यताएं/विचारधारा
समाजवाद और साम्यवाद
राज्य समाजवाद
आज समाजवाद

समाजवाद (What is Socialism) समाजवाद /साम्यवाद

 

समाजवाद आज अपना मौलिक अर्थ खो चुका है। 1989 में बर्लिन की दीवार गिरने के साथ के अंत की शुरुआत हो गई। यहां पर समाजवाद और साम्यवाद में अतंर स्पष्ट रूप में नहीं है।

साम्यवादी देश – पूर्ववर्ती सोवियत संघ, पूर्वी जर्मनी, रोमानिया,चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड, हंगरी, अल्बानिया, क्यूबा, उतरी कोरिया व जनवादी चीन।

मार्किट अर्थव्यवस्था के उदय ने समाजवाद को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

समाजवाद का रूप

सोवियत संघ – मार्क्सवाद – लेनिनवाद, वैज्ञानिक समाजवाद।

जनवादी चीन – शुरू में ‘माओवाद’ बाद में ‘डेंग  जिओजिंग’ के समय मार्किट समाजवाद में बदल गया।

यूरोपीय देश – यूरोपीय देशों में यह नव वामपंथ के रूप में था।

विकासशील देश – यहाँ पर समाजवाद का  रूप राज्य समाजवाद, विकासशील समाजवाद, लोकतांत्रिक समाजवाद था।

परिभाषा – (आॅक्सफोड) :- समाजवाद वह सिद्धांत अथवा नीति है जो उत्पादन और वित्तरण के सभी साधनों पर समाज के स्वामित्व तथा समाज के हित में उनके उपयोग का समर्थन करती है।

समाजवाद को शुद्ध रूप में किसी भी देश में नहीं अपनाया जा सका।

व्यवहारिक रूप में – पूर्ववर्ती सोवियत संघ, पूर्वी यूरोपीय देश, जनवादी चीन तथा क्यूबा, इन देशों में समाजवाद को व्यवहारिक रूप में अपनाया गया।

समाजवाद की जीत – 1917  में रूस की बोल्शेविक क्रान्ति को समाजवाद की जीत के रूप में देखा जाता है।

समाजवाद की हार – 1989  में बर्लिन की दीवार के गिर जाने के साथ ही समाजवाद की हार माना जाता है।

समाजवाद की समाप्ति

समाजवाद के अंत के अनेक कारण थे :-

(1)सोवियत संघ में साम्यवाद के अंत और उस के साथ ही 1991  में उसके विघटन के साथ साम्यवाद का भी अंत हो गया।

(2)समाजवाद का अत्यधिक आदर्शवादी होना भी उस के अंत का कारण बना, समाजवादी व्यवस्था एक आदर्शवादी व्यवस्था थी।

(3)किसानों, मजदूरों, बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों की समाजवाद में अस्था  थी और उन का विशवास था कि समाजवादी व्यवस्था से उन के सारे दुख और समस्याओं का समाधान हो जाएगा लेकिन उन के समस्याओं के समाधान के स्थान पर उन के कष्ट और बढ़ गए।

(4)साम्यवादी दल की बढ़ती तानाशाही और भ्रष्ट नेताओं तथा भ्रष्ट नौकरशाही व्यवस्था ने भी समाजवाद को समाप्त किया।

(5)संचार साधनों, मीडिया, अनुसंधान के बढ़ते प्रभाव से समाजवादी देश के लोगों में जागरूकता पैदा हुई और समाजवादी व्यवस्था के बुराइयों का विरोध किया जिस से उस व्यवस्था का अंत हो गया।

(6)लोगों में भौतिक सुखों की लालसा का जन्म हुआ और वह उपभोक्तावाद की ओर बढ़ने लगे।

इन सभी कारणों ने समाजवाद का अंत किया।

साम्यवाद /समाजवाद

साम्यवाद और समाजवाद को एक दूसरे के पर्याय के रूप में देखा जाता है यह एक दूसरे के समानार्थी नहीं है। साम्यवाद को समाजवाद से ऊंचा स्थान दिया गया है, और साम्यवादी व्यवस्था में समाज वर्ग विहीन होगा। वहीं कुछ विद्वानों ने समाजवाद को साम्यवाद से श्रेष्ठ बताया है, समाजवादी व्यवस्था संवैधानिक और शान्तिपूर्ण व्यवस्था की स्थापना की बात करता है वहीं दूसरी ओर साम्यवाद की विचारधारा हिंसक तथा क्रान्तिकारी हैं।

समाजवाद की मान्यताएं और विचारधारा

(1) तत्कालीन समाजिक, आर्थिक व राजनीतिक व्यवस्था अन्यायपूर्ण थी।

(2) सामाजिक व्यवस्था के निर्माण पर जोर और नैतिकता के आधार पर निर्माण की बात।

(3) आर्थिक विकास के साथ-साथ मानवीय गुणों के विकास की बात।

(4) समाजवादी आदर्श में आस्था रखते थे और उसे व्यवहारिक भी मानते थे।

(5) समाजवादी व्यक्ति की समस्याओं को ईश्वर का प्रकोप नहीं मानते थे बल्कि समाज में असमानता और अन्यायपूर्ण परिस्थितियों को मानते थे।

(6) पूर्व जन्म के कर्मो से इंकार, ईश्वर को जगत का कर्ता-धर्ता नहीं मानते थे और धर्म में आस्था नहीं रखते थे।

(7) धर्म में अनास्था लेकिन नैतिक मूल्यों में विश्वास रखते थे।

(8) मानवतावाद, स्वतंत्रता, समानता, मानवीय गुणों में विश्वास।

(9) यह मनुष्य के स्वभाव में बदलाव और अन्यायपूर्ण व भ्रष्टाचारी परिस्थितियों में बदलाव चाहते थे।

(10) व्यक्ति की जगह समाज को महत्व देते थे।

राज्य समाजवाद (State Socialism)

समाजवाद के कई रूप है, काल्पनिक समाजवाद, वैज्ञानिक समाजवाद,विकासशील समाजवाद, लोकतांत्रिक समाजवाद, यूरोपीय साम्यवाद, नव-वामपन्थ, मार्किट समाजवाद, समष्टिवाद, इन्हीं रूपों में से एक राज्य समाजवाद हैं।

राज्य समाजवाद में राज्य की मदद से समाज की भलाई पर जोर दिया जाता है। राज्य समाजवाद में समाज के साथ व्यक्ति की भलाई के लिए भी कार्य किए जाते हैं। इस धीरे-धीरे समाजवाद लाने पर जोर दिया जाता है और क्रांतिकारी परिवर्तन तथा तरीकों का विरोध किया जाता है। यह व्यवस्था समाज में वर्गों के बीच टकराव के स्थान पर सहयोग को बढ़ावा देता है, यह उत्पाद के साधनों को राज्य के हाथ में होने की बात करता है न कि पूँजीपतियों के। राज्य समाजवाद – काल्पनिक समाजवाद अथवा फेबियन समाजवाद का ही विकसित रुप हैं। यह समाज को महत्व देता है, समाज में आर्थिक विषमताओं की समाप्ति पर जोर देता है।

 समाजवाद में परिवर्तन

समाजवाद में परिवर्तन के मुख्यतः तीन कारण थे – 

(1) वैश्वीकरण का प्रभाव।

(2) साम्यवादी देशों का पूँजीवाद की ओर झुकाव।

(3) साम्यवादी देश के लोगों का वस्तुवाद तथा उपभोक्तावाद       से अवगत होना।

राज्य समाजवाद के विलोप के कारण

* अत्यधिक आदर्शवादी होना।

* मजदूर वर्ग, कृषक वर्ग, पूँजीपति वर्ग की हताशा।

* बर्लिन की दीवार का गिरना।

* वैश्वीकरण।

* पूँजीवाद, वस्तुवाद की ओर बढना।

* विज्ञान, संचार माध्यमों का विस्तार।

* प्रजातंत्र का अभाव, तानाशाही व्यवस्था।

* लोगों की सुख-सुविधाओं में कमी।

दोस्तों यह जानकारी आप को कैसी लगी हमे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं  हम आप के लिए और भी पाठो के नोट्स उपलब्ध कराएंगे ।

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