March 2, 2024
भारत में भाषा की राजनीतिक

भारत में भाषा की राजनीति

भारत में भाषा की राजनीति

भारत में भाषा की राजनीति सामूहिकता की अवधारणा पर आधारित भाषा के कारण परस्पर जुड़े अभेदभाव संबंधित दावों का आरंभ कांग्रेस की स्वतंत्रता पूर्व की राजनीति से है जिसमें स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का विश्वास दिया था परंतु जे वी पी (जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और पताभी सीतारामय्या) समिति का यह मानना था कि यदि सार्वजनिक भावना “आग्रह पूर्ण तथा अत्यधिक” है तो तत्कालीन मद्रास के तेलुगु भाषी क्षेत्र से आंध्र प्रदेश के गठन को स्वीकृति दी जा सकती थी जिसका वर्णन माइकल ब्रेकर ने भारतीय राजनीति में 1953 से 1956 के दौरान चले राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित कटु संघर्ष का शुरुआती कदम था” परंतु यह विडंबना रही कि भाषायी समूहिएकता के लिए अलग राज्यों के दावे 1956 में समाप्त नहीं हुए, यहां तक कि आज भी यह मांग भारतीय नेताओं के लिए चुनौती बनी हुई है परंतु समस्या यह रही है कि गठित किए गए अथवा राज्य की मांग करने वाले राज्यों में से कोई भी एकल सजातीय नहीं है तथा कुछ में तो संख्या तथा राजनीति के दृष्टि से सशक्त अल्पसंख्यक भी है जिसके परिणाम स्वरुप राज्यों के लिए मांग के कारण वर्तमान राज्यों की सीमाओं को खतरा जारी है तथा भाषायी राज्यों के बीच सीमा विवाद के संघर्ष चल रहे हैं | उदाहरण के तौर पर बेलगांव जिले से संबंधित महाराष्ट्र तथा कर्नाटक के मध्य विवाद अथवा मणिपुर के कुछ भागों के लिए नागालैंड का दावा |

भारत में भाषा की राजनीति

संपूर्ण देश के लिए एक समान भाषा नीति ना होने के कारण भाषायी राज्यों की समस्या और जटिल हुई है | क्योंकि प्रत्येक राज्य में प्रमुख क्षेत्रीय भाषा ही शिक्षा तथा सामाजिक संरचना का माध्यम रहती है, अंत: प्रत्येक की अपनी भाषा के प्रति लगाव तथा निष्ठा, अपनी भाषा के उद्गम राज्य के बाहर भी अभिव्यक्त हो जाती है | उदाहरणतया अपने उद्गम राज्य के बाहर भाषायी संस्कृतिक तथा सामाजिक समूह से अलग भाषायी समाज में एकता और सांप्रदायिक भावना सुदृढ़ की जा सकती है | अतः भाषा के आधार पर अभेद किया जाता है तथा “समूह” और “समूह के बाहर” की परिभाषा निर्धारित की जाती है |
यद्यपि या आमतौर पर माना जाता है कि भाषायी राज्यों में विषम जातीय समाज में सामूहिक स्वतंत्रता तथा स्वायत्तता आती है तथापि आलोचकों का मत है कि भाषायी राज्यों ने क्षेत्रवाद को बढ़ावा दिया है और देश में अभेद संबंधी दावों में तीव्र वृद्धि हुई है, जहां 1652 मात्र भाषाएं हैं तथा केवल 21 मान्यता प्राप्त भाषाएं हैं जिनके आधार पर राज्य बने हैं | उनका तर्क है कि भाषायी समूह की पहचान के परिणाम स्वरुप राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रीयता की भावना को बढ़ावा नहीं मिला तथा “मराठियों” के लिए महाराष्ट्र तथा गुजरातियों के लिए गुजरात इत्यादि” की भावना के कारण भाषायी अविश्वास उत्पन्न हुआ है और आर्थिक तथा राजनीतिक लाभ को भाषायी दृष्टि से परिभाषित किया गया है |

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