March 3, 2024
MPS 004 Solved Assignment 2022-23

MPS 004 Solved Assignment 2022-23

MPS 004 Solved Assignment 2022-23

MPS 004 Solved Assignment 2022-23 pdf MPS 004 Comparative Politics: Issues and Trends Solved Assignment 2022-2023 / MPS 04 Solved Assignment IN HINDI 2022-23
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Course Name / Course Tittle – (MPS) Master Of Arts Political Science
Subject Name / Course Tittle – Comparative Politics: Issues and Trends

Subject Code / Course Code – MPS 004
Medium Of Study – Hindi / English
Session – July 2022 – Jan 2023 (2022-2023) 
Last Date of submission – 30 May For July 2022 Session & 15 November For Jan 2023 Session

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MPS 004 Solved Assignment 2022-23 in hindi

प्रश्न 1. राष्ट्रवाद के प्रमुख दृष्टिकोणों की संक्षेप में व्याख्या कीजिए |

उत्तर-
भूमिका – राष्ट्रवाद को 19वीं और 20वीं शताब्दी का धर्म कहा गया है | इसे विश्व के बारे में सोचने का तरीका माना जाए तो यह ऐतिहासिक घटनाक्रमों की व्याख्या करने और वर्तमान राजनीति का विश्लेषण करने में राष्ट्र की भूमिका के महत्व पर जोर देता है और यह दावा भी करता है कि “राष्ट्रीय चरित्र” मनुष्यों के बीच भेद करने वाला एवं व्यापक तत्व है | राष्ट्रवाद यह मान्यता लेकर चलता है कि सभी मनुष्यों की एक और केवल एक राष्ट्रीयता होनी चाहिए और उसे ही उनकी अस्मिता और निष्ठा का प्रमुख कारक होना चाहिए | इसका यह अर्थ हुआ कि लोगों को अपने आप को एक राष्ट्रीयता के सदस्य के रूप में देखना चाहिए और राष्ट्र के हितों की रक्षा और प्रोन्नति के लिए आवश्यक कोई भी बलिदान करने को तैयार रहना चाहिए | सार्वभौमिक प्रयोज्यता के सिद्धांत के रूप में, राष्ट्रवाद अपने भाग्य का स्वयं फैसला करने के योग्य होने की जनता की इच्छा का, और अपनी संस्कृति और व्यक्तित्व को विकसित करने वाली जनता के रूप में सम्मान प्राप्त करने की उनकी इच्छा का भी प्रतिनिधित्व करता है |
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राष्ट्रवाद क्या है

राष्ट्रीयवाद अनेक तत्वों का मिश्रण है जिनमें से कुछ की जड़े मानवीय प्रकृति में है और जिनमें से अनेक का एक लंबा इतिहास है | फिर भी यह एक आधुनिक परिघटना है | इसका पता करना तो कठिन है ही, स्पष्ट शब्दों में इसकी व्याख्या करना और भी कठिन है | एक अर्थ में यह उस समूह का विस्तार होता है जिसका सदस्य कोई व्यक्ति है | इस अर्थ में यह एक प्रकार का सामूहिक अहंवाद होता है | नकारात्मक अर्थ में ले तो यह ‘अजनबी’ के प्रति उस भय का प्रकटीकरण है जिसकी जड़ें मानव स्वभाव में गहरे पैठी होती है | आधुनिक अर्थ में इसका जन्म परिचित भूमि और लोगों के प्रति उस प्रेम से होता है जिसे अक्सर राष्ट्रभक्ति का मूल तत्व माना जाता है | हेज के अनुसार, राष्ट्रवाद का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार से किया गया है और इसका उपयोग आमतौर पर एक राष्ट्रीयता के सदस्यों की मानसिक स्थिति को इंगित करने के लिए होता है, जो शायद पहले ही एक राष्ट्रीय राज्य के अंग है, यह वह मानसिक स्थिति होती है, जिसमें आदर्श अथवा अपने राष्ट्रीय राज्य के यथार्थ के प्रति निष्ठा और तमाम निष्ठाओं से गुरुतर होती है और अपनी राष्ट्रीयता में गर्व और इसकी आंतरिक उत्कृष्टता और मकसद में विश्वास इसके अभिन्न अंग होते हैं |
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राष्ट्रवाद के अध्ययन के दृष्टिकोण
पिछले 300 वर्षों के दौरान राष्ट्रवाद ने विभिन्न दौर देखते हैं | एक सांस्कृतिक और मानवीय अवधारणा के रूप में सामने आने के बाद ये राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, मार्क्सवाद और फासीवाद आदि अनेक विचारधाराओं ने  इसका उपयोग और दुरुपयोग किया है | पूर्व औपनिवेशिक देशों के मुक्ति संग्राम में राष्ट्रवाद का इस्तेमाल एक सशक्त हथियार के रूप में हुआ | राष्ट्रवाद को उदारवादी- तर्कसंगत से लेकर फासीवादी – अतर्कसंगत तक अनेक दृष्टिकोणों से देखा गया है | इनमें से प्रमुख दृष्टिकोण है :
* मानवतावादी
* विस्तारवादी 
* राष्ट्रवाद का माक्सवादी दृष्टिकोण
* राष्ट्रवाद का अविभाज्य – फासीवादी
* राष्ट्रवाद का साम्राज्यवाद – विरोधी दृष्टिकोण
राष्ट्रवाद का उदार मानवतावादी दृष्टिकोण 
यह औपचारिक राष्ट्रवाद का सबसे प्रारंभिक रूप है और इसका उल्लेख बोलिनब्रोक, रूसो, हर्डर, फ्रिख्ते और मातसीनी आदि की रचनाओं में मिलता है | हर्डर के अनुसार, मानव जाति प्रकृति और तर्क से अलग-अलग राष्ट्रीयताओं में बटी होती है और राष्ट्रीयता की इस विशेष मेधा में के विकास से ही व्यक्ति और मानवता दोनों मिलकर पूर्णता की दशा में प्रगति करते हैं | प्रत्येक राष्ट्र  का अपना विशिष्ट व्यक्तित्व होता है जो प्रकृति का उपहार होता है, और उस विशिष्ट मेधा के विकास का दायित्व उन व्यक्तियों पर होता है जो उस राष्ट्र के अंग होते हैं | विभिन्न राष्ट्रीयताओं में विभेद का आधार ऐतिहासिक परंपरा, अपनी विशिष्ट भाषा, साहित्य, शिक्षा प्रणाली और प्रथाएं होती है, और एक सुविकसित राष्ट्रीयता के में यह आधार ‘राष्ट्रीय आत्मा’ होती है | हर्डर ने राष्ट्रीयता के सांस्कृतिक पक्ष पर जोर दिया है | हर्डर के अनुसार विभिन्न राष्ट्रीयताओं में विभेद का आधार भूगोल, जलवायु, ऐतिहासिक परंपराएं, भाषा, साहित्य, शिक्षा और शिष्टाचार जैसे कारक होते हैं | इसी प्रकार, रूसो की लोक संबंधी अवधारणा में लोक से आशय उन लोगों से होता है जिनके पास एक समान भाषा और ऐतिहासिक परंपरा होती है | उसमें लोकप्रिय संप्रभुता के सिद्धांत को लागू करने और राजनीतिक लोकतंत्र के संचालन को सुनिश्चित करने की इच्छा होती है और उसके लिए आवश्यक साधन भी उसके पास होते हैं |
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विस्तारवादी दृष्टिकोण
मात्सीनी जैसे चिंतकों के एक दृष्टिकोण के विपरीत कि मुक्ति संग्रामों से राष्ट्रीयताओं को एकता और स्वाधीनता हासिल होगी, उदारवादी युद्धों की विजय में वही बुराइयां उभर कर आई जिनका उन्हें विनाश करना था | बल्कि वे पहले से भी कहीं अधिक विनाशकारी और व्यापक युद्धों की अग्रदूत बन गए | राष्ट्रीय एकीकरण और लोकतंत्र ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैमनस्य को और भी तेज कर दिया और जन-जन को उसका सक्रिय सहभागी  बना दिया | 1850 के दशक के बाद, औद्योगिक क्रांति अनेक यूरोपीय देशों और अमेरिका तक फैल चुकी थी | एकताबद्ध राष्ट्रों के पास अब – औपनिवेशिक तथा अन्य- विजय की नीतियों के लिए आवश्यक जुड़ाव और भावनात्मक बल था | औपनिवेशिक विवादों ने अब राष्ट्रों के मतभेद का रूप ले लिया जिसमें स्वयं आवामों के हित दांव पर थे और जिसमें आवामों के पास एक निर्णायक भूमिका निभाने का अवसर था | राष्ट्रवाद और लोकतंत्र की विजय ने राज्य की संप्रभुता को मजबूत कर दिया और राष्ट्रों को उनकी सीमाओं से भी आगे प्रसार करने का मार्ग प्रशस्त किया | इसके परिणामस्वरूप, राष्ट्रवाद की वैधता के सैद्धांतिक आधार अब उदारवाद और मानवतावाद से हटकर ‘वैज्ञानिक’ और ‘जीव वैज्ञानिक’ हो गए | कुछ लेखकों ने यह प्रस्तावना की कि राष्ट्रवाद का आधार जीव वैज्ञानिक है और साम्राज्यवाद तो ‘अस्तित्व के लिए संघर्ष और’ योग्यतम की उत्तरजीविता के विकासवादी सिद्धांत की ही परिणिति थी | इस परिवर्तन के आते ही, साम्राज्यवादी विस्तार को वैज्ञानिक आधार पर उचित ठहराया जा सका |
माक्सवादी दृष्टिकोण
राष्ट्रवाद और राष्ट्र- राज्य के विचार को मार्क्सवाद ने दूसरे ही अर्थ में लिया | मार्क्स का कहना था कि समाज के विभाजन का आधार वर्ग होता है राष्ट्रीयता नहीं | राज्य का उद्देश्य तो प्रभुत्वशाली वर्ग के निहित स्वार्थों की रक्षा करना होता है और इस प्रकार राज्य राष्ट्रीयता का नहीं बल्कि वर्ग हित का प्रतिनिधित्व करता है | अपने युग के बारे में लिखते हुए मार्क्स ने इस बात पर जोर दिया था कि यद्यपि पूंजीवादी – उदारवादी राज्य राष्ट्रीय हित की बात करता है, फिर भी औद्योगीकरण ने एक ऐसे मजदूर वर्ग को जन्म दिया है जिसका हित सार्वभौमिक है, चाहे उसकी राष्ट्रीयता कुछ भी हो | इसका परिणाम यह हुआ है कि औद्योगिक देशों में राष्ट्रीयता की अवधारणा मृतप्राय है | चरम राष्ट्रवाद एक ऐसा वैचारिक साधन है जो वर्ग प्रभुत्व में सहायक होता है | यह बुर्जुआ वर्ग के हाथों गढ़ी गई कहानी है और इसका इस्तेमाल भी वह उसी तरह कर रहा है जैसे धर्म, आचार, लोकतंत्र, स्वतंत्रता, विज्ञान, कला अथवा साहित्य का किया था | मार्क्स का कहना था कि मजदूर वर्ग का कोई राष्ट्र नहीं है, इसके वर्गीय हित सार्वभौमिक है | मजदूर वर्ग की मुक्ति तो विश्व स्तर पर उत्पादक शक्तियों के विकास में नहीं थी जो राष्ट्र- राज्य के संकीर्ण क्षेत्र में संभव नहीं था | इस प्रकार, सिद्धांत रूप में, मार्क्स और एंगेलस ने राष्ट्रीयताओं के उन्मूलन का विचार दिया जो उनके अनुसार मध्यम वर्ग की विचारधारा का सृजन था |
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अविभाज्य – फासीवादी दृष्टिकोण
19वीं शताब्दी में, राष्ट्रवाद ने स्वतंत्रता और मुक्ति आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | एक समय में यह एक प्रगतिशील सिद्धांत था जो फ्रांसीसी क्रांति से विरासत में प्राप्त लोकतांत्रिक सार्वभौमिक मूल्यों से अभिन्न रूप से जुड़ा था | किंतु 20 वीं शताब्दी में, इस राष्ट्रवादी राष्ट्रवाद की जगह अविभाज्य राष्ट्रवाद ने ले ली | इस प्रकार का राष्ट्रवाद मौरिस बारेस, चार्ल्स मोरास , आर्थर डी. जॉनिनों और एच.एस चैम्बरलेन आदि के लेखनों में प्रकट हुआ | मुसोलिनी ने अविभाज्य राष्ट्रवाद को व्यवहारिक रूप दिया, जिसे हिटलर और नात्सी जर्मनी ने बड़ी निर्भरता से इस्तेमाल | किया इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले मोरास ने किया और अविभाज्य राष्ट्रवाद को ‘राष्ट्रीय नीतियों के विशेष पालन, राष्ट्रीय अविभाज्य अथवा अखंडता के पूर्व रख -रखाव और राष्ट्रीय शक्ति की निरंतर वृद्धि की परिभाषा दी | एक सिद्धांत के रूप में, इस प्रकार के राष्ट्रवाद में इस बात पर जोर दिया था कि व्यक्ति राज्य के लिए जीता है, राज्य की सेवा करता है और राज्य को महिमामंडित करता है |
उपनिवेश – विरोधी दृष्टिकोण
बीसवीं शताब्दी में, दो विश्व युद्धों के बीच की अवधि में रूसी क्रांति, फासीवाद का उदय ऐसी दो परिघटनाएं थी जिनका राष्ट्रवाद के विचारों को यूरोप से एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसी गैर- यूरोपीय जगहों पर फैलाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा | सामूहिक रूप में, इन्होंने राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन को गति दी, जिसके परिणामस्वरूप अनेक देश यूरोप की साम्राज्यवादी ताकतों से मुक्ति पाने सके | इस प्रकार के क्रांतिकारी बदलावों ने एक नए प्रकार के राष्ट्रवाद के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | चीन,भारत , पाकिस्तान मिश्र और वियतनाम जैसे नए राष्ट्रों को जन्म देने वाली परिस्थितियां पश्चिमी देशों की परिस्थितियों से बिल्कुल भिन्न थी | ये वे देश थे जिन्हें इंग्लैंड ,फ्रांस, स्पेन और हॉलैंड जैसी साम्राज्यवादी देशों ने अपने अधीन किया हुआ था और उनकी अर्थव्यवस्थाओं का दोहन किया था | साम्राज्यवादी देश उन्हें अपनी निजी संपत्ति मानते थे और उन्हें अपनी इच्छा से बेच देते थे या चुरा लेते थे | उन्होंने इन देशों को स्वाधीनता को नष्ट कर दिया और वहां ऐसी कठपुतली सरकार छोड़ी जो साम्राज्यवाद को कोई भी नुकसान पहुंचाने की स्थिति में नहीं थी |
निष्कर्ष :- राष्ट्रवाद एक भावना है जिसका संबंध एक मातृभूमि, एक साझा भाषा, आदर्शों, मूल्यों और परंपराओं से है | यहां एक समूह ध्वज, गीत आदि जैसे प्रतीकों के साथ अपनी पहचान जोड़ता है, जो इसे दूसरों से भिन्न बनाते हैं | यह जुड़ाव एक पहचान बनाता है और इस पहचान के प्रति आकर्षण का एक अतीत और लोगों को लामबंद करने की ताकत होती है | राष्ट्रवाद के अध्ययन के अनेक दृष्टिकोण है जिनमें से प्रमुख इस प्रकार है: राष्ट्रवाद का उदार मानवतावादी दृष्टिकोण , विस्तारवादी, माकसवादी, अविभाज्य -फासीवादी दृष्टिकोण, साम्राज्यवाद विरोधी दृष्टिकोण |  राष्ट्रवाद की एक अत्यधिक महत्वपूर्ण विशेषता विभिन्न सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्तरों के लोगों को एकजुट करने की क्षमता है | यह शासक वर्ग की ईजाद है जिसके जरिये वे आम जनता की बिना शर्त निष्ठा को बनाए रखते हैं और उनमें यह विश्वास बनाए रखते हैं कि उनके बीच समानता अधिक है और विषमता कम | राष्ट्रवाद का उदय अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रांति ओके बाद हुआ |
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